Politics of Bihar | @itselfu_bpsc

0

Politics of Bihar


बिहार राजव्यवस्था

बिहार कार्यपालिका

राज्य की कार्यपालिका केंद्र की कार्यपालिका की तरह ही कार्य करती है तथा इसका प्रभाव राज्यपाल होता है।

राज्य की राजधानी - पटना से ही राज्य की कार्यपालिका राज्य का संचालन करती है।

राज्य की कार्यपालिका के राजनीतिक प्रमुख मुख्यमंत्री होते हैं। वे तथा उनकी मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से राज्य विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इनके सहायतार्थ विशेष सचिव, उप-सचिव, अन्य उच्चधिकारी तथा कर्मचारी होते हैं।

सचिवालय

राज्य के सचिवालय के प्रायः सभी विभागों में उनके प्रधान सचिवों के नियंत्रणाधीन विभागाध्यक्ष अथवा कार्यालयाध्यक्ष होते हैं। शासन की कार्यपालिका शक्ति के रूप में कार्य करते हुए समस्त आदेश या समस्त कार्य मुख्यतः हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि में सपन्न होता है

और शासनादेशों पर सचिव अथवा उनके द्वारा अधिकार प्राप्त अनुसचिव पद तक के अधिकारी हस्ताक्षर करते हैं। सचिवालय के प्रधान सचिव, विशेष सचिव, संयुक्त सचिव, उप सचिव आदि पदों पर सामान्यतः भारतीय तथा बिहार प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं।

मंत्रिपरिषद

राज्यपाल को प्रशासन में सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती है, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है। सैद्धांतिक दृष्टि से मंत्रिपरिषद एक परमर्शदात्रि समिति है, किन्तु व्यवहार में यह राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है,

जिसके परामर्श के अनुसार राज्यपाल कार्य करने को बाध्य होता है। विधि, वित्तीय व अर्थ संबंधी सभी मामलों का निर्धारण मंत्रिपरिषद ही करती है।

मुख्यमंत्री

विधानसभा के सदस्य कई राजनीतिक दलों में बंटे होते हैं, जिस दल का बहुमत होता है उसी दल का नेता मुख्यमंत्री होता है। यदि किसी दल का बहुमत नहीं हुआ तो कई दलों के पारस्परिक तालमेल से गठबंधन सरकार या मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता है।

मंत्रिपरिषद में प्रधानता मुख्यमंत्री की होती है। मुख्यमंत्री का चुनाव उसके दल अथवा गठबंधन के सहयोगी दलों के सदस्य करते हैं।

किन्तु मख्यमंत्री के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा होती है। मुख्यमंत्री राज्यपाल व मंत्रिमंडल के बीच कड़ी का कार्य करता है।

शासन संबंधी निर्णयों, मंत्रियों व पदाधिकारियों की नियुक्ति तथा विधि निर्माण कार्य में मुख्यमंत्री की भूमिका अहम होती है।

न्यायपालिका

न्यायपालिका सरकार का तीसरा प्रमुख अंग होता है। नागरिक जीवन में शासन, अनुचित हस्तक्षेप न करे और एक नागरिक दूसरे नागरिक के साथ ठीक व्यवहार करे,

इसकी देखभाल के लिए भारतीय संविधान के उपबंधों के अधीन बिहार में भी स्वतंर न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।

राज्य में सबसे ऊँची अदालत पटना उच्च न्यायालय है, जिसकी स्थापना सन 1916 ई. में हुई थी। छोटी अदालतों के अधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में अवकाश ग्रहण करते है।


बिहार विधानसभा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य का एक विधानमंडल होगा, जिसमें राज्यपाल, विधानसभा एवं विधानपरिषद् होगी।

अनुच्छेद 169 के अनुसार भारतीय संसद् किसी भी राज्य के लिए विधानपरिषद् की स्थापना या उसकी समाप्ति के लिए नियम व उपनियम बना सकती है, किन्तु इसके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।

वर्तमान में बिहार विधानमंडल में दो सदन है –

  • विधानसभा (निम्न सदन)
  • विधानपरिषद् (ऊपरी सदन)
  • विधानसभा

    विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, किन्तु आपातकाल की स्थिति में संसद द्वारा इसकी अवधि छह माह तक बढ़ाई जा सकती है। एक बार में विधानसभा का कार्यकाल अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 172 (1) में उल्लेखित है।

    किसी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिलने की स्थिति या सरकार के बहुमत खो देने की स्थिति में राज्यपाल के द्वारा विधानसभा का कार्यकाल पहले भी खत्म किया जा सकता है। विधानसभा का अधिवेशन राज्यपाल द्वारा आहूत किया जाता है, किन्तु विधानसभा के दो अधिवेशन के मध्य छह माह का अंतर होना चाहिए।

    बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में 38 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए, 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए तथा 1 सीट एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित हैं –

    विधानसभा सदस्य बनने की योग्यताएँ

  • वह भारत का नागरिक हो एवं कम-से-कम 25 वर्ष की उम्र का हो
  • वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर न हो
  • वह दिवालिया या पागल न हो
  • विधानसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 178 के अनुसार प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष का पद निर्धारित किया गया है। इनका चुनाव विधानसभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। विधानसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को कम-से-कम 14 दिन की पूर्व सूचना से विधानसभा में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है।

    सामान्य स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष चुनाव में भाग नहीं लेता किन्तु मत बराबर होने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष का मत निर्णायक होता है।


    बिहार विधानपरिषद्

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य का एक विधानमंडल होगा, जिसमें राज्यपाल, विधानसभा एवं विधानपरिषद् होगी।

    अनुच्छेद 169 के अनुसार भारतीय संसद् किसी भी राज्य के लिए विधानपरिषद् की स्थापना या उसकी समाप्ति के लिए नियम व उपनियम बना सकती है, किन्तु इसके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।

    वर्तमान में बिहार विधानमंडल में दो सदन है –

  • विधानसभा (निम्न सदन)
  • विधानपरिषद् (ऊपरी सदन)
  • विधानपरिषद् (Legislative council)

    उड़ीसा व बिहार में विधानपरिषद् की स्थापना 7 फरवरी, 1921 को संयुक्त रूप से की गयी तथा इसका प्रथम सभापति सर वाल्टर मांडे को नियुक्त किया गया था। भारत के संविधान के अनुच्छेद 169 में राज्यों में विधानपरिषद् के गठन का उल्लेख है। संविधान के अनुसार विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती, किन्तु विधानपरिषद् में कम-से-कम 40 सदस्य होने अनिवार्य हैं (अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर विधानपरिषद् की कुल सदस्य संख्या 36 है)।

  • वर्तमान में बिहार विधानपरिषद् में सदस्यों की कुल संख्या 75 है। विधानपरिषद् स्थायी सदन है, जिसका कभी विघटन नहीं होता है।
  • विधानपरिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है किन्तु प्रत्येक 2 वर्ष के अंतराल पर इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
  • विधानपरिषद् का सत्र राज्यपाल द्वारा आहूत किया जाता है।
  • किसी भी वर्ष में विधानपरिषद् के कम-से-कम दो सत्र होना आवश्यक है एवं प्रथम सत्र व अंतिम सत्र के मध्य 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
  • विधानपरिषद् के एक-तिहाई सदस्य स्थानीय संस्थाओं, नगरपालिका, जिला परिषद् आदि के सदस्यों के द्वारा चुने जाते हैं।
  • एक-तिहाई ( सदस्य विधानसभा के सदस्यों के द्वारा चुने जाते हैं। 1/12 सदस्य राज्य /के उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालयों एवं कॉलेजों में कम-से-कम तीन वर्ष का अनुभव रखनेवाले अध्यापकों के द्वारा चुने जाते हैं।
  • 1/12 सदस्य बिहार के वैसे निवासी, जो भारत के किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हों एवं जिन्होंने स्नातक की उपाधि कम-से-कम तीन वर्ष पहले प्राप्त कर ली हो, के द्वारा चुने जाते हैं।
  • शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल के द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारिता तथा समाज-सेवा के क्षेत्र में कार्य करने वाले को मनोनीत किया जाता हैं।
  • विधानपरिषद् का अधिवेशन आरंभ होने के लिए इसके कुल सदस्यों का 1/10 भाग या कम-से-कम 10 सदस्य (जो भी ज्यादा हो) का होना अनिवार्य है।
  • विधानपरिषद् के सदस्यों को सदन का सत्र प्रारंभ होने के 40 दिन पूर्व तथा सत्र समाप्त होने के 40 दिन बाद के मध्य में दीवानी मुकदमों के लिए बंदी नहीं बनाया जा सकता है।

  • बिहार में उच्च न्यायालय

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 214 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, किंतु दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय, अथवा बड़ी जनसंख्या वाले राज्य के लिए एक से अधिक उच्च न्यायालय की व्यवस्था का अधिकार भारतीय संसद् को प्राप्त है। राज्य में न्यायापालिका के शीर्ष पर उच्च न्यायालय है, जिसके नीचे जिला एवं सेशन न्यायाधीश का न्यायालय, सिविल और सेशन न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट, मुंसिफ और अन्य मजिस्ट्रेट आते हैं।

    उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। देश में न्यायाधीशों सर्वाधिक संख्या इलाहाबाद उन न्यायालय के 160 स्वीकृत पद है। बिहार में उच्च न्यायालय की स्थापना 3 फरवरी, 1916 को पटना में की गई।

    उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए योग्यताएँ

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • कम-से-कम दस वर्षों तक भारत में न्यायिक पद पर रह चुका हो
  • किसी राज्य के उच्च न्यायालय में कम-से-कम दस वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका हो।
  • 62 वर्ष की आयु से कम हो।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते राज्य की संचित निधि से दिए जाते हैं।
  • उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को हटाने की प्रक्रिया

    उच्च न्यायालय के न्यायधीशों को किसी भी सदन में कदाचार अथवा असमर्थता के आरोप पर महाभियोग लाकर एवं उसे दोनों सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से पारित करके हटाया जा सकता है।

    उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार

    अधीनस्थ न्यायालयों के संबंध में विभिन्न उपबंध संविधान के अनुच्छेद 233 से 236 तक उल्लिखित है। संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मौलिक अधिकार से संबंधित मामलों के लिए सीधे उच्च न्यायालय में जाया जा सकता है। मौलिक अधिकारों से सम्बंधित उच्च न्यायालय को निम्नलिखित लेख जारी करने का अधिकार है-

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश,
  • परमादेश लेख,
  • प्रतिषेध लेख,
  • अधिकार पृच्छा
  • उत्प्रेषण
  • उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, किन्तु इसके लिए संबंधित उच्च न्यायालय की आज्ञा आवश्यक है, इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय किसी भी उच्च न्यायालय के दिए गए आदेश के विरुद्ध स्वेच्छा से अपील ले सकता है। उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों की कार्रवाई का विवरण माँग सकता है तथा अधीनस्थ न्यायालय से किसी दूसरे अधीनस्थ न्यायालय में किसी मामलें को स्थानांतरित कर सकता है।

    बिहार में राज्यपाल

    बिहार की राज्य सरकार 3 इकाइयों में विभाजित है —

  • कार्यपालिका,
  • विधायिका
  • न्यायपालिका
  • राज्यपाल राज्य का संवैधानिक तथा कार्यपालिका का प्रमुख होता है। राज्यपाल के पद व अधिकारों का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक में किया गया है।

    राज्य का समस्त प्रशासन राज्यपाल के नाम से ही संचालित होता है। इस सन्दर्भ में राज्यपाल को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, किन्तु फिर भी वह मंत्रिपरिषद् की सलाह से कार्य करता है। सामान्यतः भारत में एक राज्य के लिए एक राज्यपाल की व्यवस्था है, लेकिन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार किसी एक व्यक्ति को दो या दो से ज्यादा राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने का राष्ट्रपति को अधिकार प्रदान करता है।

    राज्यपाल पद के लिए योग्यताएँ

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी उम्र कम-से-कम 35 वर्ष हो।
  • वह राज्य सरकार या केंद्र सरकार या दोनों के अधीन किसी सार्वजनिक उपक्रम में लाभ के पद पर न हो।
  • वह भारतीय संसद या किसी भी राज्य के विधानमंडल का सदस्य न हो।
  • राज्यपाल की नियुक्ति

    राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा 5 वर्षों के लिए की जाती है, किन्तु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल का कार्यकाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत होता है। राज्यपाल का वेतन राज्य की संचित निधि से दिया जाता है।

    अनुच्छेद 158 के अनुसार राज्यपाल के वेतन, अधिकारों एवं सुविधाओं को उसकी पदावधि तक कम नहीं किया जा सकता है।

    राज्यपाल के अधिकार

    भारतीय संविधान राज्यपाल को कार्यपालिका, वैधानिक, वित्तीय, न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए हैं तथा विशेष परिस्थितियों में विवेकाधिकार भी प्राप्त है।

    कार्यपालिका संबंधी अधिकार

  • राज्यपाल द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति की जाती है और मुख्यमंत्री की सलाह राज्यपाल अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता हैं तथा विधानसभा के एंग्लो इंडियन समुदाय से एक सदस्य राज्यपाल द्वारा ही मनोनीत किया जाता हैं।
  • विधानपरिषद् के कुल सदस्यों की संख्या का 1/6 सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवा से जुड़े हुए लोगो में से की जाती हैं।
  • राज्यपाल के द्वारा ही राज्य के महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की जाती है।
  • वैधानिक अधिकार

  • राज्य विधानमंडल का सत्र आहूत, सत्रावसान करने और विधानसभा को विघटित करने का अधिकार राज्यपाल को प्राप्त है।
  • राज्यपाल विधानमंडल का वार्षिक वित्त प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं। राज्यपाल को धन विधेयक और अनुदान माँगों की सिफारिश करने का अधिकार है।
  • विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक या अधिनियम राज्यपाल के हस्ताक्षर के पश्चात ही प्रभावी किया जा सकता है ।
  • संविधान के अनुच्छेद 213 से राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्राप्त है और उसके इस अधिकार के प्रयोग को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • विधानमंडल के किसी सदस्य के अयोग्यता संबंधी किसी विवाद में अंतिम निर्णय राज्यपाल का होता है, परंतु निर्णय लेने से पूर्व राज्यपाल को चुनाव आयोग का परामर्श लेना आवश्यक है।
  • संविधान के अनुच्छेद 352 (1) से राज्यपाल को देश में बाहरी आक्रमण या सैन्य विद्रोह की स्थिति में राज्य में आपातकाल लागू करने के लिए कोई भी अधिकार नहीं है।
  • अनुच्छेद 356 के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश राष्ट्रपति से करते हैं।
  • वित्तीय अधिकार

  • विधानसभा में धन विधेयक को राज्यपाल पूर्वानुमति के पश्चात ही प्रस्तुत किया जा सकता है ।
  • राज्य की आकस्मिक निधि से धन राज्यपाल की अनुमति से सकता है।
  • राज्यपाल को अनुदान माँगों की सिफारिश करने का अधिकार है।
  • न्यायिक अधिकार

  • जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पदोन्नति राज्यपाल द्वारा की जाती हैं। राज्यपाल किसी व्यक्ति को दिए गए दंड को कम या क्षमा कर सकते हैं। राज्यपाल को राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति को उनकी नियुक्ति में राज्यपाल से सलाह लेने का भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 (1) में प्रावधान है।
  • विवेकाधिकार

  • विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिलने की स्थिति में राज्यपाल अपने विवेक बहुमत वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं तथा राज्यपाल राष्ट्रपति को भेजे जानेवाले संदेश में स्वविवेक का प्रयोग करते हैं।

  • बिहार में प्रमुख आयोग

    राज्य निर्वाचन आयोग

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 के अंतर्गत राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में पंचायतों व नगरपालिकाओं के चुनाव का संचालन कराने हेतु एक संवैधानिक संस्था है। इस आयोग का प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती हैं।

  • पंचायतों व नगरपालिकाओं के निर्वाचन हेतु निर्वाचक नामावली तैयार कराना,
  • चुनाव का सफल संचालन
  • निर्देशन एवं नियंत्रण का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग को प्राप्त है।
  • राज्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया के सामन है।
  • बिहार मानवाधिकार आयोग

    राज्य स्तर पर मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु 3 जनवरी, 2000 को बिहार मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई थी तथा पुनः 26 जून, 2008 को इसका पुनर्गठन किया गया। जम्मू-कश्मीर और राजस्थान उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश श्री एस.एन. झा को बिहार मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

    बिहार मानवाधिकार आयोग की शक्तियों का स्रोत मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 हैं। राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष केवल भारत के किसी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता है।

    राज्य मानवाधिकार आयोग के प्रमुख कार्य जैसे – मानवाधिकार का उल्लंघन, पुलिस उत्पीड़न, अभिरक्षा (Custodial) मृत्यु, मुठभेड़ में मृत्यु, पुलिस, अन्य पदाधिकारी या लोक सेवक द्वारा व्यक्तियों को परेशान करने संबंधित मामलों, दहेज की माँग, बलात्कार, हत्या, लैगिक प्रताड़ना, महिलाओं पर अत्याचार एवं अप्रतिष्ठा, बाल मजदूर और बँधुआ मजदूर, बाल विवाह, समुचित शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित करना, गरीबी उन्मूलन तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधी कार्यक्रम, आदि में आयोग संज्ञान लेता है।

    राज्य महिला आयोग

    राज्य में महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण और कल्याण हेतु राज्य महिला आयोग का गठन किया गया है। महिलाओ को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने हेतु जिला स्तर पर विभिन्न तरीके से कार्यक्रमों का आयोजन आयोग द्वारा किया जाता है।

    राज्य महिला आयोग में एक अध्यक्ष तथा 7 अन्य सदस्य होते है, जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। 7 सदस्यों में एक सदस्य अनुसूचित जाति, एक अनुसूचित जनजाति, एक अल्पसंख्यक समुदाय, एक पिछड़ी जाति, एक विधि एवं विधान का अनुभव रखने वाला, एक किसी स्वयंसेवी संस्था का अनुभव रखनेवाली एवं एक समाज कल्याण के क्षेत्र में अनुभवी महिला को नियुक्त किये जाने का प्रावधान है।

    बिहार लोक सेवा आयोग

    अनुच्छेद 315 के अंतर्गत भारत में राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोग के गठन करने का प्रावधान किया गया है। बिहार लोक सेवा आयोग की स्थापना 1 अप्रैल, 1949 को की गयी। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या अधिकतम 62 वर्ष की उम्र (जो पहले पूर्ण हो) होता है। आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति मंत्रिपरिषद् की सलाह पर राज्यपाल के द्वारा की जाती है। बिहार लोक सेवा आयोग के प्रथम अध्यक्ष राजधारी सिन्हा थे।

    बिहार कर्मचारी चयन आयोग

    बिहार राज्य के अधिनियम संख्या-7/2002 के द्वारा वेतनमान 6500 से 10500 (पंचम वेतन आयोग) के नीचे के वर्ग 3 के अराजपत्रित पदों पर नियुक्ति के लिए बिहार कर्मचारी चयन आयोग का गठन किया गया है। इसके गठन के साथ ही विद्यालय सेवा बोर्ड का इसमें विलय कर दिया गया। इसमें अध्यक्ष एवं दो सदस्यों का पद सृजित है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के सचिव स्तरीय अधिकारी अध्यक्ष के रूप में तथा वर्ग-1 के विभिन्न पदाधिकारियों का सदस्य के रूप में राज्य सरकार मनोनयन करती है

    Post a Comment

    0Comments
    Post a Comment (0)