Geography of Bihar | Itselfu BPSC

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  • Geography of Bihar

बिहार की भौगोलिक स्थिति

बिहार गंगा के मध्य मैदानी भाग में स्थित पूर्वी भारत का राज्य है। बिहार का वर्तमान स्वरूप 15 नवंबर, 2000 को झारखंड के पृथक् होने के बाद आया है। आयताकार आकृतिवाला वर्तमान बिहार का क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर (36,357 वर्ग मील) है। यह भारत के कुल क्षेत्रफल का 2.86% है। क्षेत्रफल की दृष्टि से बिहार भारत का 13वाँ बड़ा राज्य है।

2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की जनसंख्या 10,31,04,637 है। जनसंख्या की दृष्टि से यह देश का तीसरा बड़ा राज्य है। बिहार का भौगोलिक विस्तार 24°21’10” से 27°31’15” उत्तरी अक्षांश के बीच तथा 83°19’50” से 88°17’40” पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। उत्तर से दक्षिण बिहार की लंबाई 345 किलोमीटर तथा पूरब से पश्चिम चौड़ाई 483 किलोमीटर है।

बिहार की सीमा रेखा

बिहार के पूर्व में – पश्चिम बंगाल स्थित है, जिससे स्पर्श करने वाले बिहार के 3 जिले किशनगंज, पूर्णिया एवं कटिहार हैं।

बिहार के पश्चिम में – उत्तर प्रदेश स्थित है, जिससे स्पर्श करने वाले बिहार के सर्वाधिक 8 जिले रोहतास, कैमूर, बक्सर, भोजपुर, सारण, सीवान, गोपालगंज और पश्चिमी चंपारण है।

बिहार के उत्तर में – नेपाल स्थित है, जो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण करता है। नेपाल से स्पर्श करनेवाले बिहार के 7 जिलों में पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज हैं।

बिहार के दक्षिणी में – झारखंड स्थित है, जिससे स्पर्श करने वाले बिहार के 7 जिले भागलपुर, बाँका, जमुई, नवादा, गया, औरंगाबाद और रोहतास हैं।

बिहार राज्य के 13 जिले न तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण करते हैं और न ही किसी राज्य से स्पर्श करते हैं। बिहार के सभी 38 जिलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जिला पश्चिमी चंपारण तथा सबसे छोटा जिला शेखपुरा है। राज्य के सबसे दक्षिणी भाग में गया एवं जमुई जिला तथा सबसे उत्तर में पश्चिमी चंपारण जिला स्थित है। पश्चिम में कैमूर जिले से प्रारंभ होकर पूरब में किशनगंज तक विस्तृत है। संपूर्ण राज्य कर्क रेखा के उत्तर में स्थित है।


बिहार की भौगोलिक संरचना

बिहार की भौगोलिक संरचना

बिहार में संरचनात्मक दृष्टिकोण से प्री-कैंब्रियन (Pre-Cambrian) कल्प से लेकर चतुर्थ कल्प तक की चट्टानें पाई जाती हैं। प्री-कैंब्रियन कल्प की चट्टानें धारवाड़ संरचना और विंध्यन संरचना के रूप में बिहार के दक्षिणी पठारी भाग में पाई जाती हैं। दक्षिणी पठारी भाग की प्राचीनतम चट्टानें बृहद पेंजिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग गोंडवाना लैंड का अंग हैं। उत्तरी पर्वतीय प्रदेश का निर्माण पर्वत निर्माणकारी अंतिम भू-संचलन अल्पाइन में हुआ है। भौगर्भिक दृष्टिकोण से यह समय मध्यजीव कल्प (Mesozoic) का काल है। मध्यवर्ती गंगा का मैदान चतुर्थ महाकल्प (Pleistocene) में निर्मित हुआ है। इसका निर्माण आज भी जारी है तथा राज्य के सर्वाधिक क्षेत्रफल पर इसी नवीन संरचना का विस्तार है। इस प्रकार बिहार के उच्चावच पर संरचना का व्यापक प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

भूगर्भीय संरचना के आधार पर बिहार में चार प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं –‍

  • धारवाड़ चट्टान,
  • विंध्यन चट्टान,
  • टर्शियरी चट्टान,
  • क्वार्टरनरी चट्टान
  • 1 . धारवाड़ चट्टान (Dharwar Rock):-

    प्री-कैंब्रियन युगीन धारवाड़ चट्टान बिहार के दक्षिण-पूर्वी भाग में मुंगेर जिला के खड़गपुर पहाड़ी, जमुई, बिहारशरीफ, नवादा, राजगीर, बोधगया आदि क्षेत्रों में पाई जाती है। इन क्षेत्रों में पाई जानेवाली पहाड़ियाँ छोटानागपुर पठार का ही अंग हैं। हिमालय पर्वत के निर्माण के समय मेसोजोइक काल में इस पर दबाव शक्ति का प्रभाव पड़ा, जिससे कई पैंसान (भंरश) घाटियों का निर्माण हुआ। कालांतर में जलोढ़ के निक्षेपण से ये पहाड़ियाँ मुख्य पठार से अलग हो गई। धारवाड़ चट्टानी क्रम में स्लेट, क्वार्टजाइट और फिलाइट आदि चट्टानें पाई जाती हैं। ये मूलतः आग्नेय प्रकार की चट्टान हैं, जो लंबे समय से अत्यधिक दाब एवं ताप के प्रभाव के कारण रूपांतरित हो गई हैं। इन चट्टानों में अभ्रक का निक्षेप पाया जाता है।

    2 . विंध्यन चट्टान (Vindhyan Rock):-

    विंध्यन चट्टान का निर्माण प्री-कैंब्रियन युग में हुआ है। यह चट्टान बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पाई जाती है। इसका विस्तार सोन नदी के उत्तर में रोहतास और कैमूर जिले में है। सोन घाटी में इन चट्टानों के ऊपर जलोढ़ का निक्षेप पाया जाता है। इसमें कैमूर क्रम और सिमरी क्रम की चट्टानें पाई जाती हैं। इन चट्टानों में पायराइट खनिज पाया जाता है, जिससे गंधक निकलता है। जीवाश्मयुक्त इन चट्टानों में चूना-पत्थर, डोलोमाइट, बलुआपत्थर और क्वार्टजाइट चट्टानें पाई जाती हैं। ये चट्टानें लगभग क्षैतिज अवस्था में हैं। चट्टानों में जीवाश्म की अधिकता यह प्रमाणित करती है कि यह अतीत में समुद्री निक्षेप का क्षेत्र रहा है। औरंगाबाद जिले के नवीनगर क्षेत्र में ज्वालामुखी संरचना के भी प्रमाण पाए जाते हैं।

    3 . टर्शियरी चट्टान (Tarsiary Rock):-

    हिमालय की दक्षिणी श्रेणी शिवालिक श्रेणी में पाई जाती है। इसके निर्माण का संबंध मेसोजोइक कल्प के मायोसीन और प्लायोसीन भूगर्भिक काल से है, जो हिमालय पर्वत के निर्माण के द्वितीय और तृतीय उत्थान से संबंधित है। इस श्रेणी में बालू पत्थर तथा बोल्डर क्ले चट्टानें पाई जाती हैं। निचले भाग में कांगलोमरेट चट्टान की प्रधानता है। टेथिस सागर के अवसाद से निर्मित होने के कारण इसमें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस संचित है।

    4 . क्वार्टरनरी चट्टान (Quaternary Rock):-

    क्वार्टरनरी चट्टान गंगा के मैदानी क्षेत्र में परतदार चट्टान के रूप में पाई जाती है, जिसका निर्माण कार्य आज भी जारी है। गंगा का मैदान टेथिस सागर का अवशेष है, जिसका निर्माण गंगा और उसकी सहायक नदियोंद्वारा अवसाद (निक्षेप) जमा करने से हुआ है।

    हिमालय पर्वत का निर्माण भी टेथिस सागर के मलबे पर संपीडन शक्ति से हुआ है। संपीडन (दबाव) शक्ति द्वारा जिस समय हिमालय का निर्माण हो रहा था, उसी समय हिमालय के दक्षिण में एक विशाल गर्त का निर्माण हुआ। इसी गर्त में गोंडवाना लैंड के पठारी भाग से तथा हिमालय से निकलनेवाली नदियों के द्वारा अवसादों का निक्षेपण प्रारंभ हुआ, जिससे विशाल गर्त ने मैदान का स्वरूप ग्रहण कर लिया।

    मैदान का निर्माण जलोढ़, बालू-बजरी-पत्थर और कांगलोमरेट से बनी चट्टानों से हुआ है। यह अत्यंत मंद ढालवाला मैदान है, जिसमें जलोढ़ की गहराई सभी जगहों पर समान नहीं है। इस मैदान में जलोढ़ की गहराई 100 मीटर से 900 मीटर तथा अधिकतम गहराई 6000 मीटर तक है। सर्वाधिक गहरे जलोढ़ का निक्षेप पटना के आसपास पाया जाता है।


    बिहार के प्राकृतिक प्रदेश

    बिहार के उच्चावच में अनेक प्रकार की विविधताएँ पाई जाती हैं। बिहार में पर्वत, पठार और मैदान सभी प्रकार की भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं। यद्यपि अधिकांश भू-भाग मैदानी है, लेकिन उत्तर में स्थित शिवालिक पर्वत श्रेणी तथा दक्षिण का संकीर्ण पठारी क्षेत्र भूआकृतिक विविधता उत्पन्न करते हैं। बिहार की औसत ऊँचाई समुद्र तल से 173 फीट (53 मीटर) है। भौतिक बनावट और अध्ययन की सुविधा के आधार पर बिहार को तीन भौतिक (प्राकृतिक) प्रदेश में बाँटा गया है –

    1. उत्तर का शिवालिक पर्वतीय प्रदेश एवं तराई प्रदेश उत्तर का शिवालिक पर्वतीय प्रदेश
    2. गंगा का मैदान
    3. दक्षिणी पठारी प्रदेश

    1. उत्तर का शिवालिक पर्वतीय प्रदेश एवं तराई प्रदेश उत्तर का शिवालिक पर्वतीय प्रदेश :-

    पश्चिमी चंपारण की उत्तरी सीमा (उत्तरी-पश्चिमी बिहार) पर हिमालय पर्वत की शिवालिक श्रेणी का विस्तार है। शिवालिक श्रेणी का विस्तार 932 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है। इस पर्वतीय श्रेणी की औसत ऊँचाई 80 मीटर से 250 मीटर तक है। हिमालय से निकलनेवाली नदियों द्वारा इसे अनेक स्थानों पर काट-छाँट दिया गया है। इस शिवालिक पर्वतीय प्रदेश को तीन उप-विभाग में बाँटा गया है –

  • (i) रामनगर दून की पहाड़ी,
  • (ii) हरहा घाटी या दून की घाटी,
  • (iii) सोमेश्वर श्रेणी
  • रामनगर दून की पहाड़ी

    सोमेश्वर श्रेणी के दक्षिण में स्थित रामनगर दून की पहाड़ी 32 किलोमीटर लंबी और 8 किलोमीटर चौड़ी है। इस पहाड़ी का सबसे ऊँचा भाग संतपुर है, जिसकी ऊँचाई 242 मीटर है।

    हरहा घाटी या दून की घाटी

    हरहा घाटी या दून की घाटी एक संकीर्ण अनुदैर्घ्य घाटी है, जो रामनगर दून और सोमेश्वर श्रेणी के बीच स्थित है। इस घाटी की लंबाई 21 किलोमीटर तथा क्षेत्रफल 214 वर्ग किलोमीटर है।

    सोमेश्वर श्रेणी

    शिवालिक पहाड़ी का तीसरा भाग सोमेश्वर की पहाड़ी है, जो लगभग 784 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर फैली है। तथा जिसका शीर्ष भाग बिहार को नेपाल से अलग करता है। त्रिवेणी नहर से भिखना ठोरी दर्रा तक फैली इस श्रेणी की लंबाई 70 किलोमीटर है। नदियों के तीव्र बहाव के कारण इस श्रेणी में अनेक दरों का निर्माण हुआ है, जिसमें सोमेश्वर दर्रा, भिखना ठोरी दर्रा, मरवात दर्रा आदि प्रमुख हैं। ये दरें बिहार और नेपाल के बीच यातायात का मार्ग प्रदान करते हैं। सोमेश्वर श्रेणी में ही बिहार की सर्वोच्च चोटी सोमेश्वर किला स्थित है, जिसकी ऊँचाई 880 मीटर है।

    तराई प्रदेश

    तराई प्रदेश गंगा मैदान के उत्तरी भाग में एवं शिवालिक श्रेणी के समानांतर दक्षिणी भाग में पाया जाता है। तराई प्रदेश राज्य के उत्तर-पश्चिम तथा उत्तर-पूर्वी सीमा पर पाया जाता है। इस प्रदेश में अधिक वर्षा (150 सेंटीमीटर से 200 सेंटीमीटर तक) होने के कारण घने वन एवं दलदली क्षेत्र का विकास हुआ है। उत्तरी-पूर्वी तराई प्रदेश पूर्णिया, अररिया और किशनगंज जिले में फैला हुआ है। यह बिहार का सर्वाधिक वर्षा ग्रहण करनेवाला क्षेत्र है।

    2. गंगा का मैदान :-

    गंगा के मैदान का क्षेत्रफल 90650 वर्ग किलोमीटर है, जो बिहार के कुल क्षेत्रफल का 96.27 प्रतिशत है। यह मैदान उत्तर में शिवालिक श्रेणी से लेकर दक्षिण में छोटानागपुर पठार तक फैला हुआ है। भौगर्भिक दृष्टि से यह मैदान अग्रगभीर (Foredeep) है। इस मैदान की औसत ऊँचाई समुद्र तल से 75 से 120 मीटर तक है। मैदान का निर्धारण 150 मीटर की समोच्च रेखा द्वारा होता है। समोच्च रेखा (Contour line) वह रेखा है, जो समुद्र तल से समान ऊँचाईवाले स्थानों को मिलाकर खींची जाती है। इस मैदान का ढाल पश्चिम से पूरब की ओर है। यह ढाल अत्यंत मंद (5-6 सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर) है। यह मैदान पश्चिम में अधिक चौड़ा है, जबकि पूरब की ओर इसकी चौड़ाई कम होती जाती है। बिहार का मैदान गंगा नदी द्वारा दो भागों में विभाजित है –

  • (i) उत्तरी गंगा का मैदान,
  • (ii) दक्षिणी गंगा का मैदान
  • (i) उत्तरी गंगा का मैदान

    उत्तरी गंगा के मैदान का क्षेत्रफल 56,980 वर्ग किलोमीटर है। इस मैदान का निर्माण गंगा और उसकी उत्तरी सहायक नदियों—घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, महानंदा आदि के द्वारा जमा किए गए अवसादों से हुआ है। इस मैदान का ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूरब की ओर है। यह मैदान नदियों द्वारा कई दोआब क्षेत्रों में बँटा हुआ है। दो नदियों के बीच स्थित भू-भाग को दोआब क्षेत्र कहा जाता है। इसमें घाघरा-गंडक दोआब, कोसी-गंडक दोआब, कोसी-महानंदा दोआब प्रमुख हैं। उत्तरी गंगा के मैदान का विस्तार पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीवान, गोपालगंज, सीतामढ़ी, मधुबनी, सारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा और भागलपुर जिले में है। इस मैदान में नदियों द्वारा परित्यक्त एवं विसर्पाकार गोखुर झील एवं चौर का निर्माण हुआ है। निर्माण प्रक्रिया के कारण उत्तरी गंगा मैदान में क्षेत्रीय भिन्नताएँ पाई जाती हैं। इस क्षेत्रीय भिन्नता के आधार पर उत्तरी गंगा के मैदान को कई उपविभागों में बाँटा गया है –

    (i) उप-तराई क्षेत्र (भाबर क्षेत्र) : - उप-तराई या भाबर क्षेत्र तराई प्रदेश के दक्षिण में पश्चिम से पूरब की ओर फैला हुआ है। यह उत्तरी बिहार के 7 जिलों पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज में 10 किलोमीटर चौड़ी संकीर्ण पट्टी के रूप में फैला हुआ है। इसमें कंकड़-बालू का निक्षेप पाया जाता है।

    (ii) बाँगर : - बाँगर क्षेत्र पुराना जलोढ़ निक्षेप का क्षेत्र है, जहाँ बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष नहीं पहुँच पाता है। यह क्षेत्र भाबर क्षेत्र के दक्षिण में फैला हुआ है। इसका विस्तार मुख्यत: बिहार के उत्तरी-पश्चिमी मैदानी भागों में पाया जाता है।

    (iii) खादर : - खादर क्षेत्र नवीन जलोढ़ का निक्षेप क्षेत्र है, जहाँ प्रतिवर्षं बाढ़ का पानी फैल जाता है। प्रतिवर्ष बाढ़ आने से नई मिट्टी का निक्षेप होता रहता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता कायम रहती है। खादर क्षेत्र का विस्तार उत्तरी एवं उत्तरीपूर्वी मैदान में पश्चिम में गंडक नदी से लेकर पूरब में कोसी नदी तक है।

    (iv) चौर (मन) : - उत्तरी गंगा के मैदान में प्राकृतिक रूप से जलमग्न निम्न भू-भाग पाया जाता है, जिसे चौर या मन कहा जाता है। चौर का प्रमुख उदाहरण पश्चिमी चंपारण का लखनी चौर, पूर्वी चंपारण का बहादुरपुर एवं सुंदरपुर चौर आदि हैं।

    चौर अथवा मन मूलतः गोखुर झील है, जिसका निर्माण नदियों के मार्ग परिवर्तन होने से हुआ है। ये मीठे एवं गहरे जल के प्रमुख स्रोत हैं। प्रमुख मन के उदाहरण पूर्वी चंपारण का टेटरिया मन, माधोपुर मन, पश्चिमी चंपारण का पिपरा मन, सिमरी मन, सरैया मन आदि हैं।

    (ii) दक्षिणी गंगा का मैदान

    दक्षिणी गंगा के मैदान का विस्तार दक्षिण के सीमांत पठारी प्रदेश और गंगा नदी के मध्य है। इस मैदान का कुल क्षेत्रफल 33,670 वर्ग किलोमीटर है। मैदान का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। इस मैदान का निर्माण पठारी प्रदेश से होकर बहनेवाली नदियों के निक्षेप से हुआ है। दक्षिणी मैदान की चौड़ाई पश्चिम से पूरब की ओर घटती जाती है। पूर्वी भाग में चौड़ाई कम होने का कारण गंगा नदी द्वारा प्राकृतिक कगार (बाँध) का निर्माण किया जाना है। पटना महानगर प्राकृतिक कगार पर बसा हुआ नगर है। प्राकृतिक कगार (बाँध) की ऊँचाई आसपास के भू-भाग से अधिक होने के कारण दक्षिणी बिहार की अधिकांश नदियाँ गंगा नदी में सीधे न मिलकर उसके समानांतर प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार की प्रवाह प्रणाली ‘पीनेट प्रवाह प्रणाली’ कहलाती है। इन नदियों में पुनपुन, किऊल, फल्गु आदि हैं। फल्गु नदी गंगा में मिलने से पहले ही टाल क्षेत्र में समाप्त हो जाती है। ये नदियाँ पठारी क्षेत्र से प्रवाहित होकर आती हैं, इसलिए इनके निक्षेप में बालू की प्रधानता पाई जाती है।

    प्राकृतिक कगार के दक्षिणी भाग में जलमग्न निम्न भू-भाग पाया जाता है, जिसे टाल या जल्ला क्षेत्र कहा जाता है। यह टाल क्षेत्र पटना से मोकामा तक 25 किलोमीटर की चौड़ाई में फैला है। प्रमुख टाल के उदाहरण बड़हिया टाल, मोकामा टाल, सिंघोल टाल, मोर टाल आदि हैं।

    3. दक्षिणी पठारी प्रदेश :-

    दक्षिणी पठारी प्रदेश छोटानागपुर पठार का सीमांत है। इस प्रदेश में ग्रेनाइट एवं नीस जैसी आग्नेय और रूपांतरित चट्टानें बहुलता से पाई जाती हैं। इस पठारी प्रदेश का विस्तार पश्चिम में कैमूर से लेकर पूरब में मुंगेर एवं बाँका तक है। यह बिहार का प्राचीनतम भू-खंड है, जिसमें कैमूर या रोहतास का पठार, गया का दक्षिणी भाग, गिरियक की पहाड़ी, नवादा, बाँका एवं मुंगेर का पहाड़ी क्षेत्र सम्मिलित है।

    कैमूर या रोहतास का पठार

    कैमूर या रोहतास का पठार विंध्य श्रेणी का पूर्वी भाग है। इसका विस्तार 483 किलोमीटर की लंबाई में तथा अधिकतम 80 किलोमीटर की चौड़ाई में जबलपुर (मध्य प्रदेश) से प्रारंभ होकर रोहतास (बिहार) तक है। कैमूर पठार की सतह अपरदित एवं ऊबड़-खाबड़ है। इस पठारी क्षेत्र की औसत ऊँचाई 300-450 मीटर के बीच है। इस पठार का सबसे ऊँचा भाग रोहतासगढ़ है, जिसकी ऊँचाई 495 मीटर है। यह पठार छोटानागपुर पठार से सोन नदी द्वारा अलग होता है। इस पठार में बलुआ पत्थर की अधिकता पाई जाती है।

    गया का पहाड़ी क्षेत्र

    गया, औरंगाबाद एवं नवादा जिले में अनेक पहाड़ी क्रम पाए जाते हैं। ये पहाड़ियाँ मैदानी भागों में विस्तृत हैं। इनमें जेठियन, हिंडाज की पहाड़ी, हल्दिया की पहाड़ी प्रमुख हैं। गया शहर के आसपास में रामशिला, प्रेतशिला, भूतशिला, कटारी, ब्रह्मयोनि पहाड़ियाँ स्थित हैं। इसी क्रम में जहानाबाद और गया जिले की सीमा पर बराबर एवं नागार्जुनी की पहाड़ियाँ स्थित हैं।

    राजगीर-गिरियक पहाड़ी क्षेत्र

    यह मुख्य रूप से नालंदा जिले में स्थित है। यह मूलतः गया की पहाड़ी श्रृंखला का ही विस्तार है। इन पहाड़ियों में वैभवगिरि, सोनागिरि, विपुलगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि तथा पीर की पहाड़ी प्रमुख हैं। इन पहाड़ियों में सबसे ऊँची पहाड़ी वैभवगिरि है, जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 380 मीटर है। इन पहाड़ियों में रूपांतरित चट्टान क्वार्टजाइट और स्लेट की प्रधानता है।

    नवादा-मुंगेर पहाड़ी क्षेत्र

    नवादा-मुंगेर पहाड़ी क्रम दक्षिण में नवादा जिला से प्रारंभ होकर उत्तर में गंगा नदी तक फैला हुआ है, इसमें अनेक पहाड़ी श्रृंखला स्थित हैं, जिसमें खड़गपुर की पहाड़ी, गिद्धेश्वर की पहाड़ी, सत पहाड़ी, शेखपुरा की पहाड़ी, चकाई पहाड़ी, बाकिया पहाड़ी प्रमुख हैं। खड़गपुर की पहाड़ी का विस्तार मुंगेर से जमुई तक है। यह त्रिभुजाकार आकृति का है तथा इसमें क्वार्टजाइट चट्टान की प्रधानता है।


    बिहार के भौगोलिक भागो का वर्गीकरण

    संरचना एवं उच्चावच की भिन्नता के आधार पर बिहार को तीन प्रमुख भौतिक विभाग शिवालिक पर्वतीय प्रदेश, गंगा का मैदान एवं छोटानागपुर सीमांत पठारी प्रदेश में विभक्त किया गया है। प्राकृतिक विविधता, उच्चावच में असमानता, भूमि की विषमता, मिट्टी एवं वनस्पति की विविधता बिहार के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन का आधार है। किसी विस्तृत क्षेत्र की संपूर्ण जानकारी को समरूपता के आधार पर प्राप्त कर भौगोलिक प्रदेश का निर्धारण किया। जाता है। भौगोलिक प्रदेश वह प्रदेश होता है, जहाँ जलवायु, मिट्टी, वनस्पति, भूमि उपयोग प्रतिरूप, शस्य प्रारूप, अधिवास के प्रकार आदि भौतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक तत्त्वों में एकरूपता पाई जाती है। प्राकृतिक एवं सामाजिकसांस्कृतिक तत्त्वों की समानता के आधार पर प्रो. इनायत अहमद एवं प्रो. राम प्रवेश सिंह ने बिहार को 10 भौगोलिक प्रदेश में बाँटा है –

    1. तराई प्रदेश,
    2. घाघरा-गंडक दोआब,
    3. गंडक-कोसी दोआब,
    4. कोसी-महानंदा दोआब,
    5. कर्मनाशा-सोन दोआब,
    6. सोन-किऊल दोआब,
    7. पूरब-मध्य बिहार का मैदान,
    8. गंगा दियारा क्षेत्र,
    9. कैमूर पठार,
    10. अभ्रक प्रदेश।

    तराई प्रदेश

    यह प्रदेश गंगा के उत्तरी मैदान में उत्तरी-पश्चिमी एवं उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित है। उत्तर-पश्चिम में शिवालिक की सोमेश्वर श्रेणी और रामनगर दून की पहाड़ियों पर 140 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा के कारण भूमि कृषि योग्य नहीं है। परंपरागत तरीकों के साथ-साथ नई तकनीक के द्वारा कृषि की जाती है। उत्तरी-पूर्वी तराई प्रदेश पूर्णिया, अररिया और किशनगंज में है। यह प्रदेश बिहार में सबसे अधिक वर्षावाला क्षेत्र है। यहाँ 200 सेंटीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है। कृषि के लिए यहाँ अच्छी भूमि है, जिसमें धान, जूट एवं गन्ने की अच्छी पैदावार होती है। अधिक वर्षा के कारण यह प्रदेश दलदली एवं घने जंगल का क्षेत्र है। इस प्रदेश में ऊबड़-खाबड़ भूमि के कारण प्रकीर्ण बस्तियाँ अधिक पाई जाती हैं।

    घाघरा-गंडक दोआब

    यह प्रदेश 120 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षावाला मैदानी क्षेत्र है। सारण, सीवान और गोपालगंज जिले में विस्तृत यह प्रदेश चौरस जलोढ़ मैदान है। यहाँ धान, मक्का, गेहूँ, गन्ना, तिलहन और दलहन आदि फसलों का उत्पादन होता है। कृषि की दृष्टि से समृद्ध इस प्रदेश में कृषि से जुड़े उद्योग भी हैं। गन्ने का उत्पादन अधिक होने से इस प्रदेश में चीनी उद्योग का अधिक विकास हुआ है। चीनी उद्योग का प्रमुख केंद्र गोपालगंज, छपरा, सीवान, मीरगंज, महरौरा आदि हैं।

    गंडक-कोसी दोआब

    इस प्रदेश में पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, बेगूसराय आदि जिले हैं। इस प्रदेश में उद्योगों की अधिकता है। चीनी उद्योग और फल प्रसंस्करण उद्योग यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। दरभंगा-आम, मुजफ्फरपुर – लीची और हाजीपुर-केला की बागबानी के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रदेश की मुख्य फसल धान, मक्का, गन्ना, गेहूँ, जौ, दलहन, तिलहन आदि हैं। गन्ना, तंबाकू और लाल मिर्च यहाँ की प्रमुख नगदी फसल हैं। चीनी उद्योग के केंद्र चनपटिया, सुगौली, समस्तीपुर, मोतिहारी, बगहा आदि हैं। बरौनी इस प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध औद्योगिक नगर है। यहाँ उर्वरक कारखाना, तेलशोधक कारखाना और ताप विद्युत केंद्र स्थित है। बरौनी एवं मुजफ्फरपुर में दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है।

    कोसी-महानंदा दोआब

    इस प्रदेश में पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, खगड़िया और सहरसा जिले आते हैं। यह प्रदेश बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण कृषि, उद्योग और परिवहन आदि की दृष्टि से पिछड़ा क्षेत्र है। यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, जिससे कोसी और उसकी सहायक नदियाँ प्रतिवर्ष बाढ़ की विभीषिका लाती हैं। यद्यपि यहाँ कृषि की जाती है, लेकिन बाढ़ की संभावना के कारण खेती का भविष्य निश्चित नहीं होता। सरकार ने कोसी परियोजना द्वारा बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित कराने के प्रयास किए हैं।

    कर्मनाशा-सोन दोआब

    इस प्रदेश में भोजपुर, रोहतास, कैमूर और बक्सर जिले आते हैं। यह जलवायविक दृष्टि से कम वर्षावाला क्षेत्र है, लेकिन सोन नदी पर बैराज बनाकर व्यवस्थित नहर प्रणाली का विकास किया गया है। इस प्रदेश में नहरों द्वारा सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है। यहाँ अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या है, जो कृषि पर आधारित है। धान यहाँ की प्रमुख फसल है। अन्य फसलों में गेहूँ, दलहन, तिलहन तथा आलू प्रमुख हैं। इस प्रदेश में कृषि-आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएँ है। इस प्रदेश में सर्वाधिक विकास चावल मिल का हुआ है।

    सोन-किऊल दोआब

    दक्षिण बिहार के मैदान में स्थित यह दोआब प्रदेश निम्न वर्षा का क्षेत्र है, जहाँ अक्सर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। पटना, जहानाबाद, गया, नालंदा, औरंगाबाद, अरवल, लखीसराय और नवादा जिले इस प्रदेश में आते हैं। अरवल और औरंगाबाद में पूर्वी सोन नहर प्रणाली के द्वारा सिंचाई की व्यवस्था है। धान, गेहूँ, चना, मसूर, खेसारी आदि यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। इस प्रदेश में बिहारशरीफ और ओबरा में रेशमी वस्त्र उद्योग, गया के मानपुर में हथकरघा उद्योग और गलीचा उद्योग का विकास हुआ है। औरंगाबाद में सीमेंट उद्योग एवं खाद्य तेल उद्योग स्थापित किया गया है।

    पूरब-मध्य बिहार का मैदान

    इस प्रदेश में मुंगेर, बाँका और भागलपुर जिले आते हैं। इनमें से कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। कृषि और उद्योग के मामले में यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। धान, तिलहन और दलहन यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। इस प्रदेश में सिंचाई की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं है। चंदन, किऊल एवं बरुआ नदी पर जलाशय का निर्माण कर सिंचाई सुविधा का विकास किया गया है। मुंगेर में बंदूक, तंबाकू एवं दुग्ध उद्योग तथा भागलपुर में सिल्क उद्योग का विकास हुआ है।

    गंगा दियारा क्षेत्र

    यह क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित रहता है और बाढ़ के बाद जो भूमि दिखाई देती है, उसे दियारा क्षेत्र कहते हैं। यह नवीन जलोढ़ का क्षेत्र है। यहाँ पर कृषक अस्थायी अधिवासों (प्रकीर्ण बस्तियों) के सहारे खेती करते हैं। घासफूस और बॉस से बने घर बाढ़ के आने से पहले ही हटा लिये जाते हैं। रबी फसल और सब्जियों की उपज के लिए यह क्षेत्र प्रसिद्ध है। प्रत्येक वर्ष बाढ़ में नए दियारा क्षेत्र का निर्माण होता है।

    कैमूर पठार

    इसका विस्तार दक्षिण-पश्चिम बिहार के कैमूर और रोहतास जिले में है। यह पठार विंध्य पर्वत का अंग है। यह पठारी क्षेत्र लगभग 350 मीटर ऊँचा है। इसका क्षेत्रफल 1200 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ की मुख्य फसल धान, गेहूँ, जौ आदि हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ पत्थर-आधारित उद्योग विकसित हुए हैं। कैमूर पठार में पायराइट्स एवं फॉस्फेट पाया जाता है। पायराइट्स आधारित गंधक उद्योग अमझोर में तथा चूना पत्थर-आधारित सीमेंट उद्योग बंजारी में स्थापित है।

    अभ्रक प्रदेश

    यह मुख्य रूप से झारखंड के कोडरमा जिले की अभ्रक पट्टी है, जिसका विस्तार बिहार के पठारी प्रदेशों झाझा, जमुई, गया और नवादा के क्षेत्रों तक मिलता है। यहाँ अभ्रक बलथर मिट्टी में मिश्रित रूप में मिलता है। लकड़ी, तसर (सिल्क) और लाह का उत्पादन इस क्षेत्र में होता है। कृषि में धान, दलहन और तिलहन का उत्पादन होता है।

    इस प्रकार बिहार के समस्त धरातलीय रूप को उपर्युक्त दस भागों में बाँटा गया है। समरूपता के आधार पर कुछ क्षेत्र समृद्ध और विकसित हैं तो कुछ क्षेत्र अति पिछड़े हैं। भूमि की भिन्नता से ऐसा होना स्वभाविक है, लेकिन मानव श्रम और तकनीकी से इस अंतर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


    बिहार की प्रमुख नदियाँ

    किसी देश या प्रदेश का जलप्रवाह तन्त्र वहाँ की स्थलाकृति और जलवायु से प्रवाहित होता है। बिहार के जलप्रवाह पर भी इन्हीं तत्त्वों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। यहाँ के जलप्रवाह तन्त्र में अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ हैं। मुख्य नदी गंगा है जो राज्य के मध्य भाग में पश्चिम से पूर्व को प्रवाहित होती है। इसमें उत्तर तथा दक्षिण से निकलने वाली नदियाँ मिलती हैं। कुछ नदियाँ छोटा नागपुर के पठार से निकलकर दक्षिण और पूर्व में प्रवाहित होती हैं।

    बिहार की प्रमुख नदियाँ

    जलप्रवाह तन्त्र को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –

    1. गंगा में उत्तर से आकर मिलने वाली नदियाँ – सरयू, अजय, किऊल, गण्डक, बूढी गण्डक, कमला, बलान, बागमती, कोसी तथा महानन्दा हैं।

    2. गंगा में पठारी भाग से आकर मिलने वाली नदियाँ – सोन, उत्तरी कोयल, पुनपुन, चानन, फल्गु, सकरी, पंचाने तथा कर्मनाशा हैं।

    गंगा नदी (Ganga River)

  • कुल लंबाई – 2525 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 445 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 15,165 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – गंगोत्तरी हिमनद का गोमुख (उत्तराखंड)
  • मुहाना – बंगाल की खाड़ी
  • गंगा नदी बिहार के मध्य भाग में पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह नदी उत्तर प्रदेश से बिहार के बक्सर जिला में चौसा के पास प्रवेश करती है। इस क्षेत्र में गंगा, गंडक, सरयू (घाघरा) और कर्मनाशा नदी बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा का निर्धारण करती हैं। इसमें उत्तर दिशा से (बाएँ तट पर) घाघरा, गंडक, बागमती, बलान, बूढ़ी गंडक, कोसी, महानंदा और कमला नदी आकर मिलती हैं, जबकि दक्षिण दिशा से (दाएँ तट पर) सोन, कर्मनाशा, पुनपुन, किऊल आदि नदियाँ आकर मिलती हैं। प्रमुख नदियों में सर्वप्रथम बिहार क्षेत्र में गंगा में सोन नदी दानापुर से 10 किलोमीटर पश्चिम में मनेर के पास आकर मिलती है।

    गंगा नदी बिहार एवं झारखंड के साहेबगंज जिले के साथ सीमा रेखा बनाते हुए बंगाल में प्रवेश करती है। गंगा अपने यात्रा क्रम में बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर, भागलपुर, कटिहार आदि जिलों में प्रवाहित होती है।

    घाघरा (सरयू नदी) [Ghaghara (Saryu River)]

  • कुल लंबाई – 1080 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 83 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 2,995 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – गुरला मंधाता चोटी के पास नां फा (नेपाल)
  • संगम – गंगा नदी (छपरा के पास)
  • यह बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा का निर्धारण करती है। अयोध्या तक यह नदी सरयू के नाम से जानी जाती है, फिर इसका नाम घाघरा हो जाता है। यह नदी सारण जिले में छपरा के समीप गंगा में मिल जाती है। इसे ऊपरी भाग में लखनदेई और करनाली के नाम से भी जाना जाता है।

    गंडक नदी (Gandak River)

  • कुल लंबाई – 630 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 260 किमी
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 4,188 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – अन्नपूर्णा श्रेणी के मानंगमोट और कुतांग के मध्य से
  • संगम – गंगा नदी (हाजीपुर)
  • गंडक नदी सात धाराओं के मिलने से बनी है। सप्तगंडकी, कालीगंडक, नारायणी, शालिग्रामी, सदानीरा आदि कई नामों से जानी जाने वाली गंडक नदी की उत्पत्ति नेपाल के अन्नपूर्णा श्रेणी के मानेगमोट और कुतांग (नेपाल एवं तिब्बत की सीमा) के मध्य से हुई है। गंडक नेपाल में अन्नपूर्णा श्रेणी को काटकर गार्ज का निर्माण करती है। यह नदी भैसालोटन (पश्चिमी चंपारण) के पास बिहार में प्रवेश करती है। पश्चिमी चंपारण जिले के वाल्मीकि नगर में बैराज का निर्माण किया गया है। यह नदी सारण और मुजफ्फरपुर की सीमा निर्धारित करते हुए सोनपुर और हाजीपुर के मध्य से गुजरती हुई पटना के सामने गंगा में मिल जाती है। इसी संगम पर विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र का मेला (सोनपुर पशु मेला) प्रत्येक वर्ष आयोजित होता है। इस नदी को नेपाल में गंडक नारायणी या गंडकी नाम से जाना जाता है।

    बूढ़ी गंडक नदी (Old Gandak River)

  • कुल लंबाई – 320 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 320 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 9,601 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – सोमेश्वर श्रेणी के विशंभरपुर के पास चऊतरवा चौर
  • संगम – गंगा नदी (मुंगेर)
  • सहायक नदियां – डंडा, पंडई, मसान, कोहरा, बालोर, सिकटा, तिऊर, तिलावे, धनउती, अंजानकोटे आदि हैं।
  • यह नदी गंडक के समानांतर उसके पूर्वी भाग में प्रवाहित होती है। बूढ़ी गंडक नदी उत्तरी बिहार के मैदान को 2 भागों में बाँटती है। हिमालय से निकलकर उत्तर बिहार में प्रवाहित होने वाली उत्तर बिहार की सबसे लंबी नदी है। इसकी उत्पत्ति सोमेश्वर श्रेणी के विशंभरपुर के पास चउतरवा चौर से हुई है। यह उत्तर बिहार की सबसे तेज जलधारावाली नदी है, जिसका बहाव उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है। यह गंडक नदी की परित्यक्त धारा है, जो मुख्य नदी के पश्चिम में खिसक जाने से प्रवाहित हुई हैं।

    बागमती नदी (Bagmati River)

  • कुल लंबाई – 597 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 394 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 6,500 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – महाभारत श्रेणी (नेपाल)
  • संगम – लालबकेया नदी (देवापुर)
  • सहायक नदियां – विष्णुमति नदी, लखनदेई नदी, लाल बकेया नदी, चकनाहा नदी, जमुने नदी, सिपरीधार नदी, छोटी बागमती और कोला नदी।
  • बूढ़ी गंडक की प्रमुख सहायक नदी बागमती नदी है। यह नदी दरभंगा, मुजफ्फरपुर और मधुबनी जिले में प्रवाहित होती है।

    कमला नदी (Kamala River)

  • कुल लंबाई – 328 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 120 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 4,488 किमी.
  • उद्गम स्थल – महाभारत श्रेणी (नेपाल)
  • कमला यह नदी नेपाल की महाभारत श्रेणी से निकलकर तराई क्षेत्र से प्रभावित होती हुई बिहार में जयनगर (मधुबनी जिला) में प्रवेश करती है। मिथिला क्षेत्र में इसे गंगा के समान पवित्र माना जाता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँसोनी, ढोरी और भूतही बलान आदि हैं। बलान नदी इसमें पीपराघाट के निकट मिलती है। कमला नदी कई धाराओं में विभक्त हो जाती है। इनमें से अनेक का नाम कमला ही है। इसकी एक प्रमुख धारा कोसी से मिलती है, जबकि एक धारा खगड़िया जिले में बागमती नदी में मिलती है।

    कोसी नदी (Kosi River)

  • कुल लंबाई – 720 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 260 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 11,410 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – गोसाई स्थान (सप्तकौशिकी, नेपाल)
  • संगम – गंगा नदी (कुरसेला के पास)
  • कोसी का मूल नाम भी कौशिकी है। कोसी नदी सात धाराओं के मिलने से बनी है। इन धाराओं का नाम इंद्रावती, सनकोसी, ताम्रकोसी, लिच्छूकोसी, दूधकोसी, अरुणकोसी और तामूरकोसी है। त्रिवेणी के पास ये सभी धाराएँ मिलकर कोसी कहलाती हैं। कोसी नदी बाढ़ की विभीषिका के कारण ‘बिहार का शोक’ कहलाती है। यह नदी सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया आदि जिलों में प्रवाहित होती है। कोसी नदी मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है तथा पिछले 200 वर्षों में 150 किलोमीटर पूरब से पश्चिम की ओर स्थानांतरित हुई है। कोसी नदी कुरसैला के पास गंगा में मिलने से पूर्व डेल्टा का निर्माण करती है।

    महानंदा नदी (Mahananda River)

  • कुल लंबाई – 360 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 376 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 6,150 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – महाभारत श्रेणी (नेपाल)
  • संगम – गंगा नदी (मनिहारी, कटिहार के पास)
  • यह उत्तरी बिहार के मैदान में प्रवाहित होने वाली पूरब की नदी है। कई स्थानों पर बिहार और बंगाल के साथ सीमा रेखा का निर्धारण करती है। हिमालय से निकलकर बिहार के पूर्णिया और कटिहार जिले में प्रवाहित होती हुई गंगा में मिल जाती है। पठारी प्रदेश की नदियों में प्रमुख नदी सोन, पुनपुन, फल्गु, कर्मनाशा, उत्तरी कोयल, अजय, हरोहर, चंदन, बढुआ आदि हैं।

    सोन नदी (Son River)

  • कुल लंबाई – 780 किमी.
  • बिहार में लंबाई – 202 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 15,820 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – अमरकंटक चोटी (मध्य प्रदेश)
  • संगम – गंगा नदी (दानापुर एवं मनेर के बीच)
  • हिरण्यवाह तथा सोनभद्र के नाम से प्रसिद्ध सोन नदी दक्षिण बिहार की सबसे प्रमुख नदी है। सोन के उद्गम के निकट से ही नर्मदा एवं महानदी भी निकलती हैं, जिससे अरीय प्रवाह प्रणाली का निर्माण होता है। यह नदी भंरश घाटी से प्रवाहित होती है। यह नदी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा झारखंड में प्रवाहित होते हुए बिहार के रोहतास जिले में प्रवेश करती है। यह दक्षिण बिहार में प्रवाहित होनेवाली गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी है। सोन नदी की प्रमुख सहायक नदी गोपद, रिहंद, कन्हर एवं उत्तरी कोयल है। सोन नदी पर दक्षिण-पश्चिम बिहार की सबसे प्रमुख सिंचाई योजना निर्मित है। इस नदी पर प्रथम बाँध 1873-74 में डेहरी में बनाया गया था। बाद में इस नदी पर इंद्रपुरी बराज का निर्माण 1968 ई. में किया गया। आरा के पास कोईलवर में 1440 मीटर लंबा रेल-सह-सड़क पुल 1862 ई. में सोन नदी पर निर्मित किया गया, जो वर्तमान में अब्दुल बारी पुल के नाम से प्रसिद्ध है। यह भारत का सबसे लंबा रेल पुल है। 1900 ई. में इस नदी पर डेहरी के पास नेहरू रेल पुल का निर्माण किया गया है।

    फल्गु नदी (Falgu River)

  • कुल लंबाई – 235 किमी.
  • उद्गम स्थल – उत्तरी छोटानागपुर पठार (हजारीबाग)
  • संगम – गंगा नदी (टाल क्षेत्र)
  • इसकी मुख्य धारा निरंजना कहलाती है। बोधगया के पास इसमें मोहाने नामक नदी मिलती है। मोहाने के मिलने के बाद ही इसे फल्गु नदी के नाम से जाना जाता है। ये सभी नदियाँ मौसमी नदी हैं। निरंजना नदी के तट पर ही गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। गया में इस नदी के तट पर पितृ पक्ष का मेला लगता है, जिसमें अपने पूर्वजों का पिंडदान किया जाता है। यह नदी अंत:सलिला या लीलाजन के नाम से भी जानी जाती है। जहानाबाद जिले में बराबर पहाड़ी के पास यह नदी दो शाखाओं में बँट जाती है। आगे चलकर फल्गु नदी अनेक शाखाओं-भूतही, कररूआ, लोकायन, महत्तवाइन आदि में विभक्त हो जाती है।

    पुनपुन नदी (Punpun River)

  • कुल लंबाई – 200 किमी.
  • बिहार में जलग्रहण क्षेत्र – 7,747 वर्ग किमी.
  • उद्गम स्थल – छोटानागपुर पठार (पलामू)
  • संगम – गंगा नदी (फतुहा के पास)
  • पुनपुन नदी एक मौसमी नदी है, जो कीकट और बमागधी के नाम से भी जानी जाती है। यह नदी बिहार के औरंगाबाद, अरवल तथा पटना जिले में गंगा के समानांतर प्रवाहित होती हुई फतुहा के पास गंगा नदी में मिल जाती है। दरधा, यमुना, मादर, बिलारो, रामरेखा, आद्री, धोबा और मोरहर पुनपुन की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

    अजय नदी (Ajay River)

  • कुल लंबाई – 288 किमी.
  • उद्गम स्थल – बटबाड़ (जमुई)
  • संगम – गंगा (पश्चिम बंगाल)
  • अजय नदी जमुई जिले के दक्षिण में 5 किलोमीटर दूर बटबाड़ से निकलती है। यह नदी बिहार से झारखंड में देवघर जिले में प्रवेश करती है। इसे अजयावती या अजमती नाम से भी जाना जाता है। यह नदी पूरब एवं दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होते हुए बंगाल में प्रवेश कर गंगा नदी में मिल जाती है।

    कर्मनाशा नदी (Karnnasha River)

  • कुल लंबाई – 192 किमी.
  • उद्गम स्थल – सारोदाग (कैमूर)
  • संगम – गंगा नदी
  • कर्मनाशा का अर्थ होता है—कर्म का नाश करनेवाला। यह नदी विंध्याचल की पहाड़ियों में सारोदाग (कैमूर) से निकलकर चौसा के पास गंगा नदी में मिल जाती है। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार इस नदी को अपवित्र या अशुभ माना जाता है।

    चानन नदी (Chanan River)

    इस नदी को पंचाने भी कहा जाता है। इसका मूल नाम पंचानन है, जो अपभंरशित होकर चानन कहलाने लगा। यह नदी पाँच धाराओं के मिलने से विकसित हुई है, इसलिए इसे पंचानन कहा जाता हैं। इस नदी की प्रमुख धाराएँ -पैमार, तिलैया, धरांजे, महाने आदि छोटानागपुर पठार से निकलती हैं। ये सारी धाराएँ राजगीर के पहाड़ी के अवरोध के कारण नालंदा जिला के गिरियक के पास एक होकर आगे प्रवाहित होती हैं।

    क्यूल नदी (Kyul River)

    इसकी उत्पत्ति हजारीबाग के पठार से हुई है। यह बिहार में जमुई जिला के सतपहाड़ी के पास प्रवेश करती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ बर्नर, अंजन, हरोहर (हलाहल) आदि हैं। लखीसराय जिला के सूर्यगढ़ा के पास गंगा नदी में मिल जाती है।

    सकरी नदी (Sakari River)

    सकरी नदी का उद्गम स्थल झारखंड में छोटानागपुर पठार का उत्तरी भाग (हजारीबाग पठार) है। यह नदी बिहार के गया, पटना, नवादा और मुंगेर जिले में प्रवाहित होती हुई गंगा नदी में मिल जाती है। इस नदी को सुमागधी के नाम से भी जाना जाता है।


    बिहार की प्रमुख झीलें

    बिहार के मैदानी भागों में अनेक प्राकृतिक झीलें पाई जाती हैं। बिहार के उत्तरी भाग में गंगा के मैदान में निम्न ढाल के कारण नदी बहाव अत्यंत मंद हो जाता है। जिस कारण नदी अपने साथ बहाकर लाए गए अवसाद को उसी स्थान पर निक्षेपित कर देती है, इसके फलस्वरूप विसर्पाकार आकृति का निर्माण होने लगता है। विसर्पाकार प्रवाह एवं नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन के कारण गंगा, बूढ़ी गंडक, कोसी, महानंदा आदि नदियों द्वारा गोखुर झील का निर्माण हुआ है।

    उत्तरी बिहार के मैदान में पाई जानेवाली मुख्य झीलों में काँवर झील कुशेश्वर झील, घोघा झील (घोघा चाप), सिमरी बख्तियारपुर झोल, उदयपुर झोल आदि प्रमुख हैं। बिहार में झीलनुमा जलमग्न क्षेत्र को ताल, चौर, मन आदि नामों से भी जाना जाता है। ये जलमग्न क्षेत्र आर्द्रभूमि (Wetland) कहलाते हैं। बिहार की प्रमुख झीलें निम्नलिखित हैं –

    काँवर झील -

    बेगूसराय के मंझौल गाँव में काँवर झील स्थित है। इस झील का क्षेत्रफल 16 वर्ग किलोमीटर है। यह एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील है, जिसका निर्माण गंडक नदी के विसर्पण से हुआ है। इस झील में पाए जाने वाली प्रमुख वनस्पति निम्न है, जिनमें हाइड्रा लेरिसिलाय, पोटोमोगेंटन, वेल्सनेरिया, लेप्लराल्स, निफसा, मिंफोलोड्स, सरपस वेटल्वेरिया आदि प्रमुख हैं। इस झील में सर्दी के दिनों (नवंबर-जनवरी) में साइबेरियाई क्षेत्र के प्रवासी पक्षी आते हैं। प्रमुख पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली के अनुसार लगभग 60 प्रजातीय पक्षी मध्य एशिया से सर्दी के दिनों में यहाँ निवास के लिए आते हैं तथा मूल रूप से लगभग 106 प्रजाति के पक्षी यहाँ निवास करते हैं।

    कुशेश्वर स्थान झील -

    कुशेश्वर स्थान झील दरभंगा के कुशेश्वर में स्थित है। जिसका क्षेत्रफल 20 वर्ग किलोमीटर से 100 वर्ग किलोमीटर तक बढ़ता-घटता रहता है। वर्षा काल में जल की अधिकता के कारण झील का अत्यधिक विस्तार हो जाता है।इस झील में कमला, करेह आदि नदियों जल एकत्रित होता है। यह झील मछली उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। यहाँ भी प्रवासी पक्षी पेलिकन डालमटिया (Pelicia Dalmatia) तथा साइबेरियन क्रेन (Siberian Cranes) सर्दी के मौसम में प्रवास करते हैं। 1972 ई. में इस झील को पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया है।

    घोघा झील -

    कटिहार जिले के मनिहारी क्षेत्र में घोघा झील स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 5 वर्ग किलोमीटर है। इस झील के आसपास कई छोटी-छोटी झीलें स्थित हैं।

    सिमरी-बख्तियारपुर झील -

    सिमरी-बख्तियारपुर झील बिहार के सहरसा जिले में स्थित है। जिसका निर्माण कई छोटी-छोटी झीलों के मिलने से हुआ है। इसमें जमुनिया, सरदिया, कुमीबी, गोबरा आदि झीलें प्रमुख हैं।


    बिहार के प्रमुख जलप्रपात

    जलप्रपात का नामनदीस्थान
    ककोलतकोडरमा पठार से उतरने वाली धाराककोलत (नवादा)
    सुखलदरीकनहररोहतास
    धुआँकुंड (30 मीटर)काव, धोबाताराचंडी (रोहतास)
    दुर्गावती (खादर कोह) (80 मीटर)दुर्गावतीछानपापर (रोहतास)
    जिआरखंडफुलवरियाजिआरखंड (भोजपुर)
    तमासीनमहाने
    खुआरी दाह (180 मीटर)असानेरोहतास
    राकिमकुंडगायघाटरोहतास
    ओखारीनकुंड (90 मीटर)गोपथरोहतास
    सुआरा (120 मीटर)पूर्वी सुआरारोहतास
    देवदारी (58 मीटर)कर्मनाशारोहतास पठार (रोहतास)
    तेलहरकुंड (80 मीटर)पश्चिम सुआरारोहतास पठार (रोहतास)



    बिहार के प्रमुख खनिज अयस्क

    खनिजस्थान
    अभ्रकगया (दिबौर, भलुआरीकला, विषनपुर, मझुली) नवादा, मुंगेर, जमुई, बिंजैसा, महेश्वरी, नावाडीह एवं चकाई
    चूना पत्थररोहतास (जदुनाथपुर, कनकपुर, जारदाग, नावाडीह, काटुडार, पीपराडीह), रोहतासगढ़, चूना इट्टन, रामडिहरा, डुमरवार, बैंगलिया। सर्वोत्तम किस्म का चूना पत्थर रोहतास तथा कैमूर के पठार में पाया जाता है ।
    चीनी मिट्टीभागलपुर (कसरी, झरना, पनथरघाटा, लेहवाबख, समुखिया, हरणकारी), बांका (कटोरिया), एवं मुंगेर (खड़गपुर की पहाड़ियाँ, भण्डारी, पनारी)
    बाँक्साइटमुंगेर (खड़गपुर की पहाड़ियाँ, खपरा, मेरा, ठाढ़ी, बैंता, सारंग) व रोहतास।
    सजावटी पत्थरबांका (कधार, झिलसी, जामदान), भागलपुर (श्याम बाजार), मुंगेर (खड़गपुर की पहाड़ी)।
    पेट्रोलियमबिहार के पूर्णिया, कटिहार और निकटवर्ती क्षेत्रों में संभावित भण्डार।
    सोनाजमुई (करमटिया), पश्चिमी चम्पारण, वाल्मीकिनगर। जमुई के सोनी नामक स्थान पर नयी खोज की गयी है।
    मैगनीजमुंगेर एवं गया
    टिनगया, देवराज व चकखण्द
    डोलोमाइटरोहतास (बंजारी)
    एस्बेस्टसमुंगेर
    मोनोजाइटयह थोरियम, सीरियम, यूरेनियम लैथेनक का मिश्रण है, जो पैग्मेटाइट शैलों में पाया जाता है। पैग्मेटाइट शिलाएँ गया और मुंगेर जिलों में मिलती है।
    पायराइट्सरोहतास, जिलान्तर्गत अमझोर के अतिरिक्त सोन नदी की घाटी, बंजारी तथा कोरियारी आदि क्षेत्र।
    सोप स्टोनजमुई (शंकरपुर)
    क्वार्टजाइटमुंगेर (खड़गपुर की पहाड़ियाँ), जमालपुर, जमुई (सोनी, चकाई), गया (रामशिला, प्रेतशिला की पहाड़ियाँ) ।
    शोरा रेहसीवान, गोपालगंज, पूर्वी चम्पारण (महेसी, पीपरा, पचरूखिया), मुजफ्फरपुर (साहिबगंज, याहयापुर), पटना, बेगूसराय (मझौला, भोजा), सारण (सरैया, मांझी, छाता, भगवान बाजार), समस्तीपुर (नाजीपुर, किशनपुर, तमका), गया एवं मुंगेर (बरियारपुर)।
    अग्नि-सह मिट्टीमुंगेर, भागलपुर
    यूरेनियमगया
    कोयलाऔरंगाबाद
    गंधकरोहतास का अमझोर
    क्वार्ट्ज़जमुई
    बैरीलियमगया एवं नवादा
    सीसाभागलपुर
    कांच पत्थरभागलपुर
    सिलीमैनाइटगया
    लिथियमगया


    बिहार की प्रमुख फसलें तथा उत्पादन क्षेत्र

  • चावल – रोहतास, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, अरवल, बक्सर
  • गेहूँ – रोहतास, गया, दरभंगा
  • मक्का – सारण, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, बेगूसराय, मुंगेर
  • जौ – पश्चिमी चंपारण, सहरसा, पूर्णिया
  • मडुआ/रागी – सहरसा, मुजफ्फरपुर, सारण
  • बाजरा – पटना, मुंगेर, गया
  • तीसी – पटना, भोजपुर, गया
  • राई, सरसों – पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा
  • तिल – पश्चिमी चंपारण, शाहाबाद
  • अरहर – दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मुंगेर
  • चना – भोजपुर, बक्सर
  • मसूर – पटना, चंपारण, गया
  • खेसारी – पटना, गया, भोजपुर
  • गन्ना – चंपारण, सारण, मुजफ्फरपुर
  • जूट – पूर्णिया, कटिहार
  • तंबाकू – दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मुंगेर, समस्तीपुर, सहरसा
  • आलू – पटना, नालंदा, सारण, समस्तीपुर

  • फसल उत्पादन में बिहार का भारत में स्थान

    फसलस्थान
    धानचौथा
    गेहूँछठा
    तंबाकूतीसरा
    जूटदूसरा
    तिलहनसातवाँ
    लीचीप्रथम
    आमप्रथम
    जौदूसरा
    मडुआप्रथम
    शहदप्रथम
    मखानाप्रथम
    मक्कातीसरा


    नदियों के किनारे स्थित बिहार के प्रमुख शहर

    बिहार के जलप्रवाह तन्त्र को दो वर्गों में विभक्त किया गया है, गंगा में उत्तर से आकर मिलने वाली नदियाँ और गंगा में पठारी भाग से आकर मिलने वाली नदियाँ, इन नदियों के किनारे बिहार के अनेकों शहर बसे हुए है, इन नदियों के किनारे बसे हुए प्रमुख शहर इस प्रकार है –

    शहरनदी
    पटनागंगा
    छपरागंगा
    भागलपुरगंगा
    मुंगेरगंगा
    मोकामागंगा
    बक्सरगंगा
    छपरासरयू
    हाजीपुरगंडक
    सोनपुरगंडक
    फतुहापुनपुन
    खगड़ियाबूढ़ी गंडक
    समस्तीपुरबूढ़ी गंडक
    मुजफ्फरपुरबूढ़ी गंडक
    बेतियाबूढ़ी गंडक
    गयाफल्गु
    दरभंगाबागमती
    जहानाबाददरधा


    बिहार की प्रमुख जनजाति

    बिहार से विभाजित होकर नया राज्य बनने के पश्चात झारखंड में जनजातियों की संख्या बहुत कम हो गई, किन्तु कुछ जनजातियों अभी भी हैं, जो बिहार की समृद्ध सामाजिक संस्कृति को अपनी प्राचीन संस्कृति से योगदान देती हैं। बिहार में पाए जानेवाली प्रमुख जनजातियाँ निम्नलिखित हैं

    गोंड - यह जनजाति बिहार के छपरा, चंपारण और रोहतास जिलों में पाई जाती है। ये लोग गैर-आदिवासियों के साथ रहते हैं तथा इनकी भाषा मुंडारी हैं।

    खोंड - यह कृषि कार्यों में मजदूरी करनेवाली जनजाति है, जो शाहाबाद क्षेत्र में निवास करती है। इनकी भाषा स्थानीय सदानी हैं।

    बेड़िया - इस जनजाति के लोग प्रायः बिखरकर रहते हैं, जो अधिकतर मुंगेर जिले में रहते हैं और स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं।

    उराँव - प्रोटोऑस्ट्रेलाइड और द्रविड़ परिवार से संबंधित इस जनजाति के लोग मुख्य रूप से झारखंड में निवास करते हैं। इस जनजाति आर्थिक जीवन में मिश्रित संरचना के दर्शन होते हैं।

    संथाल - संथाल जनजाति भी मुख्य रूप से झारखंड में निवास करने वाली जनजाति हैं, जो बिहार में पूर्णिया, भागलपुर, सहरसा आदि जिलों में निवास करती हैं। इन्हें भी प्रोटोऑस्ट्रेलाइड परिवार से संबंधित माना जाता है। इनकी भाषा संथाली है, जो ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा-परिवार की है। सिंगबोंगा इनका पूज्य देवता हैं।

    खैरवार - खैरवार जनजाति भी मुख्य रूप से झारखंड में निवास करने वाली जनजाति हैं, जो बिहार राज्य के रोहतासगढ़ क्षेत्र में भी पाई जाती है। इस जनजाति के लोगों की भाषा मुंगरी हैं।

    गोराइत - बिहार के गया और भोजपुर जिलों में निवास करनेवाली यह जनजाति प्रोटोऑस्ट्रेलाइड समूह की है। इनके सामाजिक जीवन में परिवार को सबसे छोटी इकाई माना जाता है तथा यह एकल परिवार पद्धति को अपनाते हैं।

    चेरो - चेरो जनजाति भी मुख्य रूप से झारखंड के पलामू में निवास करने वाली जनजाति हैं, चेरो जनजाति के कुछ लोग बिहार के गया, रोहतास, भोजपुर और मुंगेर जिलों में पाए जाते हैं। इस जनजाति के लोग स्वयं को क्षत्रिय और चौहानांशीय राजपूत मानते हैं।

    कोरा - कोरा जनजाति बिहार के जमुई, कटिहार और मुंगेर जिलों के कुछ हिस्सों में निवास करती है, इनकी भाषा मुंडारी है। इस जनजाति का सामान्य व्यवसाय कृषि है, किन्तु ये लोग वन-उत्पाद और मजदूरी पर अधिक आश्रित हैं।

    कोरवा - कोरवा जनजाति के लोग रोहतास, पूर्णिया, मुंगेर और कटिहार जिले में निवास करते हैं। इनकी सामाजिक व्यवस्था में एकल परिवार और स्वजातीय विवाह की परंपरा है। इस जनजाति का व्यवसाय झूम कृषि तथा शिकार हैं।

    मुंडा - मुंडा जनजाति बिहार के बक्सर और रोहतास जिले में निवास करते हैं। इनकी भाषा मुंडारी है। मुंडा जनजाति भी झूम कृषि पर निर्भर हैं। सिंगबोंगा को यह अपना सर्वोच देवता मानते हैं, जो पृथ्वी से संबंधित है।


    बिहार की बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना

    कोसी परियोजना

    भारत और नेपाल सरकार की यह संयुक्त जल परियोजना है। कोसी परियोजना के निर्माण के लिए भारत और नेपाल सरकार के मध्य वर्ष 1954 में नेपाल के साथ एक समझौता किया गया, जिसे वर्ष 1961 ई. में पुनः संसोधित किया गया। कोसी परियोजना के निर्माण के प्रमुख उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, भूमि संरक्षण आदि है। कोसी नदी सर्वप्रथम चतरा गार्ज के पास पर्वत को काटकर मैदान में प्रवेश करती है। कोसी परियोजना में मुख्यत: दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है

  • पूर्वी कोसी नहर प्रणाली,
  • पश्चिमी कोसी नहर प्रणाली।

  • पूर्वी कोसी नहर प्रणाली

    इस नहर प्रणाली से नेपाल एवं बिहार के मधेपुरा, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार आदि जिलों में सिंचाई की जाती है। पूर्वी कोसी नहर पर कटैया में 20 मेगावाट क्षमता का विद्युत उत्पादन केंद्र स्थापित है। पूर्वी नहर प्रणाली द्वारा लगभग 5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। पूर्वी कोसी नहर प्रणाली में मुख्य नहर की लंबाई 44 Km है तथा इसकी 4 शाखाएँ हैं —

  • मुरलीगंज नहर, लंबाई 64 Km
  • जानकीनगर नहर, लंबाई 82 Km
  • पूर्णिया (बनमंखी) नहर, लंबाई 64 Km
  • अररिया नहर, लंबाई-52 Km

  • पश्चिमी कोसी नहर प्रणाली —

    इस नहर की लंबाई 115 Km है। इस नहर से बिहार के मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि जिलों में सिंचाई की जाती है। पूर्वी नहर प्रणाली द्वारा लगभग 3.25 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है

    गंडक परियोजना

    गंडक नदी परियोजना बिहार तथा उत्तर प्रदेश की संयुक्त परियोजना है। वर्ष 1959 ई. के समझौते के आधार पर नेपाल को भी गंडक परियोजना से लाभ मिल रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत वाल्मीकि नगर (बिहार) में त्रिवेणी घाट नामक स्थान पर बाँध निर्मित किया गया है। यह बाँध बिहार तथा नेपाल में विस्तृत है, इसलिए इसे त्रिवेणी नहर प्रणाली भी कहते हैं। इस परियोजना के अंतर्गत दो मुख्य नहर का निर्माण किया गया है —

    पूर्वी त्रिवेणी नहर —

    इसे तिरहुत नहर के नाम से भी जाना जाता हैं, इस नहर की कुल लंबाई 293 Km है तथा तिरहुत नहर द्वारा लगभग 6.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की जाती है। इस नहर द्वारा बिहार के पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर आदि जिलों में सिंचाई होती है।

    पश्चिमी त्रिवेणी नहर —

    पश्चिमी त्रिवेणी नहर की कुल लंबाई 200 Km है, जो नेपाल में 19 Km, उत्तर प्रदेश में 112 Km तथा बिहार में 69 Km भाग में विस्तृत है। इस नहर को सारण नहर के नाम से भी जाना जाता हैं तथा इस नहर प्रणाली द्वारा लगभग 4.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।

    नेपाल में गंडक परियोजना के अंतर्गत दो और नहर पूर्वी नेपाल नहर और पश्चिमी नेपाल नहर, स्थित हैं। पश्चिम नेपाल नहर पर सूरजपुरा (नेपाल) में तथा पूर्वी नहर पर वाल्मीकि नगर (नेपाल) में जल विद्युत केंद्र स्थापित है। जिनकी उत्पादन क्षमता 15-15 मेगावाट है।

    सोन परियोजना

    सोन परियोजना के अंतर्गत वर्ष 1874 ई. में डेहरी के पास बारून नामक स्थान पर बाँध निर्मित किया गया था। इस बाँध की लंबाई 3801 Meter तथा ऊँचाई 2.44 Meter है। डेहरी के पास से सोन नदी से दो नहर निकाली गई हैं —

  • पूर्वी सोन नहर,
  • पश्चिमी सोन नहर।

  • पूर्वी सोन नहर —

    इस नहर की कुल लंबाई 130 Km है, जो वारून से पटना तक विस्तृत है। इस नहर द्वारा औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, अरवल और पटना जिले के लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती है।

    पश्चिमी सोन नहर —

    इस नहर द्वारा रोहतास, कैमूर, बक्सर, भोजपुर आदि जिलों के लगभग 3 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर की सिंचाई की जाती है।

    सोन नहर प्रणाली पर 2 जल विद्युत केंद्र स्थापित किए गए हैं —

  • डेहरी जल विद्युत केंद्र (6.6 मेगावाट,)
  • बारून जल विद्युत केंद्र (3.3 मेगावाट)

  • बिहार के प्रमुख गर्म जलकुंड

    नामस्थान
    ब्रह्मकुंडराजगीर (बिहार का सबसे गरम जलकुंड)
    सप्तधारा/सतधरवाराजगीर
    सूर्यकुंडराजगीर
    मखदूमकुंडराजगीर
    नानककुंडराजगीर
    गोमुखकुंडराजगीर
    लक्ष्मणकुंडमुंगेर
    सीताकुंडमुंगेर
    रामेश्वरकुंडमुंगेर
    ऋषिकुंडमुंगेर
    जन्मकुंडमुंगेर
    भीमबाँधमुंगेर
    श्रृंगार ऋषिकुंडमुंगेर
    भरारी कुंडमुंगेर
    पंचतरकुंडमुंगेर
    अग्निकुंडगया


    बिहार में मृदा संसाधन

    बिहार राज्य के 90 % भाग पर जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, जिसका निर्माण गंगा नदी के उत्तर और दक्षिण के जलोढ़ मैदान में नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से निर्मित है। बिहार सरकार के कृषि अनुसंधान विभाग के अनुसार बिहार की मिट्टी का वर्गीकरण किया गया है। इस वर्गीकरण का आधार मूल चट्टान, भू-आकृति, भौतिक एवं रासायनिक संरचना है। कृषि अनुसंधान विभाग के द्वारा बिहार की मृदा को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया गया है

  • उत्तर बिहार के मैदान की मृदा
  • दक्षिण बिहार के मैदान की मृदा
  • दक्षिणी सीमांत पठार की मृदा
  • उत्तरी बिहार के मैदान की मृदा -

    उत्तरी बिहार के मैदान में शिवालिक श्रेणी (पश्चिमी चंपारण का पर्वतीय भाग) को छोड़कर मुख्यतः जलोढ़ मृदा पाई जाती है। जिसका निर्माण हिमालय से प्रवाहित होने वाली गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, महानंदा और उसकी सहायक नदियों द्वारा हुआ है। शिवालिक क्षेत्र में पर्वतीय मृदा पाई जाती है। उत्तर बिहार के मैदान की मिट्टी को कृषि अनुसंधान विभाग के द्वारा चार उप-वर्गों में बाँटा गया है

  • उप-हिमालय पर्वतपदीय मृदा
  • तराई मृदा
  • बांगर (जलोढ़) मृदा
  • खादर मृदा
  • उप-हिमालय पर्वतपदीय मिट्टी- यह मृदा चंपारण के उत्तरी-पश्चिमी भाग के सोमेश्वर श्रेणी के आसपास पाई जाती है। पर्वतीय ढालों पर अधिक वर्षा के कारण मिट्टी की परत पतली होती है, जिस कारण यह मृदा काफी उपजाऊ होती है। इस क्षेत्र में चिकनी मृदा प्राप्त होती है, जिसका रंग हल्का भूरा एवं पीला है। इस क्षेत्र में अधिक वर्षा होने के कारण मृदा में अधिक आर्द्रता (नमी) पाई जाती है। इस मृदा में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें धान, मक्का, जौ आदि हैं।

    तराई मृदा - इस मृदा का विस्तार बिहार में पश्चिमी चंपारण से किशनगंज तक है। पर्वतपदीय क्षेत्र में जल के सतत भूमि में रिसाव के कारण यहाँ मृदा में भरपूर मात्रा में आर्द्रता मिलती है। इस मृदा में कंकड़ के छोटे कण भी पाए जाते हैं तथा कई जगहों पर दलदली भूमि का भी विकास हुआ है। इस मृदा का रंग हल्का भूरा या पीला होता है। इस मृदा में चूने की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। यह मिट्टी धान, पटसन और गन्ने की खेती के लिए अनुकूल होती है। इस मृदा को बलसुंदरी मृदा के नाम से भी जाना जाता है।

    पुरानी जलोढ़ (बांगर) मृदा - इस मृदा का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष नहीं पहुँच पाता है। इस मृदा का विस्तार मुख्यत: घाघरा-गंडक दोआब और बूढ़ी गंडक के पश्चिमी भाग में है। इस मृदा को बलसुंदरी मृदा के नाम से भी जाना जाता है, इस मृदा की प्रकृति क्षारीय होती है, जिसमें चूना और पोटाश की अधिकता होती है तथा फॉस्फोरस और नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है। इस मृदा में उगाई जाने वाली प्रमुख फसल मक्का, ईख, धान, गेहूँ और तंबाकू है।

    खादर मृदा - नदियों द्वारा प्रतिवर्ष बाढ़ के पश्चात् छोड़े गए अवसादों से खादर मृदा (नवीन जलोढ़ मृदा) का निर्माण होता है। इस मृदा का रंग गहरा भूरा होता है। इसमें चीका (Clay) की प्रधानता होती है तथा कहीं-कहीं बालू भी अधिकांश मात्रा में मिलती है। इस मृदा का विस्तार गंगा घाटी, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी और महानंदा की निचली घाटी में है। इस मृदा में नाइट्रोजन की कमी पाई जाती हैं।

    दक्षिण बिहार के मैदान की मृदा -

    यह मृदा गंगा के दक्षिण में पाई जाती है। इसका विस्तार गंगा नदी तथा छोटानागपुर पठार के मध्य स्थित है। बिहार के दक्षिणी भाग में जलोढ़ मृदा का विस्तार सोन, पुनपुन, फल्गु तथा उनकी सहायक नदियों के निक्षेपण से हुआ है। मृदा की संरचनात्मक के आधार पर दक्षिणी बिहार की मृदा चार भागों में वर्गीकृत किया गया है –

  • कगारी मृदा
  • टाल मृदा
  • पुरानी जलोढ़ मृदा
  • बलथर मिट्टी
  • कगारी मृदा - यह मृदा नदियों के तट पर तटबंध के रूप में पाई जाती है। गंगा नदी के दक्षिणी तट पर, सोन, किऊल, पुनपुन, फल्गु आदि नदियों के किनारे, इस मृदा का विकास हुआ है। यह चूना-प्रधान मृदा है। इसका गठन हल्का एवं रंग भूरा होता है तथा इस मृदा में उगाई जाने वाली प्रमुख फसल मकई, जौ, सरसों, मिर्च आदि हैं।

    टाल मृदा - टाल निम्न भूमि का क्षेत्र है, जो वर्षाऋतु में जल-प्लावित रहता है। यह मृदा कगारी मिट्टी के दक्षिण बक्सर से भागलपुर तक 8 से 10 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में विस्तृत है। यह भूरे रंग की मोटे कणवाली मृदा है। यह मृदा दलहन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

    पुरानी जलोढ़ मृदा - इस मृदा का विस्तार टाल क्षेत्र के दक्षिण में बक्सर, भोजपुर, उत्तरी गया, उत्तरी रोहतास, नालंदा, जहानाबाद, मुंगेर, पटना आदि क्षेत्रों में है। यह मृदा बिहार के सर्वाधिक प्रदेश में पाई जाती है तथा इसका रंग गहरा भूरा से लेकर पीला तक होता है। इस मृदा में बालू, सिल्ट और चीका का मिश्रण पाया जाता है। इस मृदा में पाई जाने वाली प्रमुख फसलें धान, गेहूँ, बाजरा, अरहर आदि हैं।

    बलथर मिट्टी - यह मृदा छोटानागपुर पठार और गंगा के मिलन क्षेत्र में पाई जाती है। इस मृदा का विस्तार कैमूर से भागलपुर तक है। इसे लाल व पीली मृदा के नाम से भी जाना जाता है। इस मृदा में हल्के कंकड़ मिलते हैं और इसमें लाल रंग की अधिकता होती है। इस मृदा की प्रकृति अम्लीय होती है। इस मृदा में अत्यधिक अपरदन के कारण इस मृदा में कृषि की संभावना अत्यधिक कम होती है। इस मृदा में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें मुख्यतः मक्का, ज्वार, बाजरा, आलू आदि हैं।

    दक्षिणी सीमांत पठार की मृदा -

    दक्षिण बिहार क्षेत्र के सीमांत पठारी प्रदेश में मुख्यतः लाल और पीले रंग की मृदा पाई जाती है। सीमांत पठारी क्षेत्र की मृदा को मुख्यत: 2 वर्गों में विभाजित किया गया है –

    लाल बलुई मृदा (कैमूर पहाड़ क्षेत्र) - यह मृदा कैमूर एवं रोहतास के पठारी क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मृदा में बालू के साथ-साथ चीका और लेटेराइट मृदा के अंश भी पाए जाते हैं। प्राकृतिक वनस्पति की अधिकता के कारण इस क्षेत्र की मृदा में जीवांश की मात्रा भी पाई जाती है। इस मृदा में उगाई जाने वाली मुख्य फसल ज्वार, बाजरा, मकई, मड़आ आदि हैं।

    लाल व पीली मृदा - इस मृदा का विस्तार बिहार के जमुई, मुंगेर के खड़गपुर पहाड़ी, बाँका, नवादा, गया और औरंगाबाद के पठारी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस मृदा का निर्माण ग्रेनाइट, नीस, शिस्ट आदि चट्टानों के विखंडन से हुआ है। लौह तत्त्व की अधिकता के कारण इस मृदा का रंग लाल होता है तथा इसमें पोषक तत्त्व तथा आर्द्रता की कमी होती है। इस मृदा में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें में मुख्यतः मोटे अनाज, दलहन आदि हैं।


    बिहार में वन

    बिहार राज्य का अधिकांश क्षेत्रफल मैदानी है। अत्यधिक जनसंख्या घनत्व और कृषि भूमि पर दबाव के कारण प्राकृतिक वनस्पति, पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। बिहार में अधिकांश वर्षा मानसूनी जलवायु के कारण होती है, अतः यहाँ वनस्पति के निर्धारण में वर्षा की मात्रा एक प्रमुख कारक है। बिहार के कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर में से 6845 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर वन हैं, जो बिहार के कुल क्षेत्रफल का 7.21% है। बिहार में वर्षा की मात्रा के आधार पर प्राकृतिक वनस्पति को मुख्यत: दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • आर्द्र पर्णपाती वन (Wet deciduous forest)
  • शुष्क पर्णपाती वन (Dry deciduous forest
  • आर्द्र पर्णपाती वन (Wet deciduous forest)- वह क्षेत्र जहाँ 120 Cm से अधिक वार्षिक वर्षा होती है उन क्षेत्रों में आर्द्र पर्णपाती वन पाए जाते है। इन्हे मुख्यत: दो वर्गों में विभाजित किया गया है –

  • सोमेश्वर एवं दून श्रेणी के वन
  • तराई क्षेत्र का वन
  • सोमेश्वर एवं दून श्रेणी के वन - यह वन मुख्यतः पश्चिमी चंपारण में पाए जाते है। इस क्षेत्र में वर्षा की मात्रा 160 CM से अधिक होती है। उच्च भूमि और पहाड़ी ढालों पर पाए जाने वाले आर्दै पर्णपाती वनों के प्रमुख वृक्ष शाल (Sharea Robusta), शीशम, खैर, सेमल, तून आदि हैं। ऊँचाई के कारण इन क्षेत्रों में सवाना प्रकार की वनस्पति भी पाई जाती है।

    तराई क्षेत्र का वन - यह वन तराई क्षेत्र बिहार के उत्तरी-पश्चिमी तथा उत्तरी-पूर्वी भागों में पाए जाते है। यह वन बिहार के पूर्णिया, सहरसा, अररिया एवं किशनगंज आदि जिलों में एक संकीर्ण पट्टी के रूप में विस्तृत है। तराई क्षेत्र के वनों की प्रमुख वनस्पतियाँ नरकट, झाड़, बाँस, घास, हाथी घास, सवई आदि हैं। इस प्रकार की वनस्पति मुख्यत: निम्न दलदली भूमि में पाई जाती है।

    शुष्क पर्णपाती वन (Dry deciduous forest)- वह वन क्षेत्र जहाँ 120 Cm से कम वार्षिक वर्षा होती है उन क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते है। इन वनों में मुख्यत: झाड़ी, घास तथा छोटे-छोटे पौधे पाए जाते हैं। शुष्क पर्णपाती वनों का विकास बिहार के पूर्वी मध्यवर्ती भाग और दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग में हुआ है। शुष्क पर्णपाती वनों के प्रमुख वृक्ष शीशम, महुआ, खैर, पलाश, आसन, आँवला, अमलतास, आबनूस आदि हैं।

    बिहार में वनों के संरक्षण के लिए इन्हे 3 वर्गों में विभाजित किया गया है –

  • सुरक्षित वन (Reserve Forest),
  • आरक्षित वन (Protected Forest),
  • अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest)
  • सुरक्षित वन (Reserve Forest) के अंतर्गत पशुओं को चराने तथा लकड़ी काटने व एकत्रित करने की अनुमति नहीं होती है, तथा इन्हें सरकारी संरक्षण में रखा जाता है।

    आरक्षित वन (Protected Forest), के अंतर्गत पशुओं को चराने एवं सीमित मात्रा में लकड़ी काटने एवं एकत्रित करने की अनुमति सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं।

    अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest) में पशुओं को चराने तथा लकड़ी काटने के लिए सरकार द्वारा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है, लेकिन इसके लिए शुल्क लिया जाता है।


    बिहार में वन्य जीव-जंतु एवं संरक्षण

    भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा भारत में वन्य जीव-जंतु संरक्षण हेतु योजनाओं का क्रियान्वयन एवं निर्देशन किया जाता है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। वन्य जीवन (सुरक्षा) अधिनियम, 1972 में वन्य जीवन के संरक्षण एवं विलुप्त होती जा रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत दुर्लभ और ख़त्म होती जा रही प्रजातियों के व्यापार पर प्रतिबन्ध है। वर्तमान में बिहार राज्य में 12 वन्य जीव अभयारण्य एवं एक राष्ट्रीय उद्यान हैं।

    वन्य जीव अभयारण्य

    बिहार राज्य सरकार द्वारा वन्य जीव-जंतु, पक्षी एवं पर्यावरण के संरक्षण के लिए 13 क्षेत्रों को पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र (Eco Sensitive Zone) घोषित किया गया हैं। पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र (Eco Sensitive Zone) के अंतर्गत वन्य प्राणी अभयारण्य की सीमा से 2 किलोमीटर तक का वन क्षेत्र शामिल किया गया है। जो निम्नलिखित हैं

  • नागी बाँध पक्षी अभयारण्य, जमुई,
  • नकटी बाँध पक्षी अभयारण्य, जमुई,
  • वाल्मीकि वन्य जीव अभयारण्य, पश्चिमी चंपारण,
  • वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिमी चंपारण,
  • वाल्मीकि टाइगर रिजर्व, पश्चिमी चंपारण,
  • कुशेश्वर स्थान पक्षी अभयारण्य, दरभंगा,
  • गौतम बुद्ध वन्य जीव अभयारण्य, गया,
  • भीमबाँध वन्य जीव अभयारण्य, मुंगेर,
  • विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन आश्रयणी, भागलपुर,
  • उदयपुर वन्य जीव अभयारण्य, पश्चिमी चंपारण,
  • पंत वन्य जीव अभयारण्य, राजगीर, नालंदा,
  • बरेला झील पक्षी आश्रयणी, वैशाली,
  • कैमूर वन्य प्राणी आश्रयणी, कैमूर एवं रोहतास।
  • बिहार में वर्तमान समय में एक राष्ट्रीय उद्यान (National Park) एवं 12 वन्य जीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries) हैं। वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान (Valmiki National Park) बिहार का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिमी चंपारण में स्थित है, इसकी स्थापना वर्ष 1989 ई. हुई थी।

  • वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान (Valmiki National Park) में गैंडा, जंगली कुत्ता, बाघ, तेंदुआ, हिरण, काला भालु, जंगली भैंस आदि संरक्षित हैं।
  • गौतम बुद्ध वन्य जीव अभयारण्य (Gautam Buddha Wildlife Sanctuary) गया में स्थित है, जिसमें तेंदुआ, हिरण, चीता, साँभर, चीतल आदि पाए जाते हैं।
  • विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य (Vikramshila Gangeti Dolphin Sanctuary) में डॉल्फिनो की संख्या 240 – 500 के मध्य है।
  • भीमबाँध वन्य जीव अभयारण्य (Bhimbandh Wildlife Sanctuary) में साँभर, जंगली सूअर, तेंदुआ, भालु, भेड़िया, नीलगाय, बंदर, लंगूर, आदि संरक्षित हैं।

  • बिहार में सिंचाई के प्रमुख साधन

    बिहार में सिंचाई के चार प्रमुख साधन हैं –

  • नहर,
  • कुआँ,
  • नलकूप,
  • तालाब
  • नहरें (Canals)

    नहरें बिहार में सिंचाई का प्रमुख साधन है। बिहार में 11 प्रमुख नहरें एवं इनकी उप-शाखाएँ हैं, जो विभिन्न जिलों में विस्तृत हैं। बिहार में नहरों को दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं –

    नित्यवाही नहरें – वह नहरें जिनमे वर्ष भर जल भंडारण रहता हैं नित्यवाही नहरें कहलाती है। उत्तरी बिहार की अधिकांश नहरें नित्यवाही नहरें हैं, जो या तो सीधे नदियों से या उन पर निर्मित बांधो के कृत्रिम जलाशयों से निकाली गई हैं।

    मौसमी नहरें (अनित्यवाही नहरें) – वह नहरे जो नदियां से निकाली गई हैं, किन्तु इनमें नदियों से वर्षा काल का अतिरिक्त जल प्रवाहित होता है तथा अतिरिक्त समय इनमे बहुत कम पानी उपलब्ध होता है।

    नलकूप (Tube well)

    नलकूप बिहार में सिंचाई का दूसरा प्रमुख साधन हैं। बिहार में गंगा के मैदान की भौगोलिक बनावट पातालतोड़ कुआँ (Artigion Well) की तरह है, जिस कारण इस क्षेत्र में भूमिगत जल कम गहराई पर पाया जाता है। यह नलकूप (Tubewell) सिंचाई के लिए आदर्श स्थिति उत्पन्न करता है।

    तालाब (Pond)

    तालाबों द्वारा सिंचाई एक पुरानी पद्धति है, जो बिहार राज्य में लगभग सभी जिलों में अपनाई जाती है। तालाब प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार हैं। इनमें जल का भंडारण कर दिया जाता है, जो सिंचाई में उपयोग होता है।

    कुएँ (Well)

    इसके अतिरिक्त कुएँ प्राचीन समय से ही बिहार में सिंचाई का प्रमुख साधन रहे हैं। गंगा के मैदान में भू-जलस्तर पर्याप्त ऊँचाई पर है। कहीं-कहीं तो 10 फीट खोदने पर जल का स्रोत मिलने लगता है। कुओं से पानी निकालने के लिए ढेकली और रहट का प्रयोग किया जाता है, जो नालियों द्वारा खेतों तक पहुँचता है।




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